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एड्स के खिलाफ लड़ाई का प्रतीक जंगल

Nainital

Updated Sat, 01 Dec 2012 12:00 PM IST
हल्द्वानी। कुछ लोग जिंदा होते हुए भी गुमनाम रहते हैं और मौत के बाद भी उन्हें याद नहीं किया जाता। एड्स के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाला ऐसा ही नाम था फौजी का। फौजी जब तक जिंदा रहा वह जिंदादिली से एड्स के खिलाफ लड़ता रहा। इस खतरनाक बीमारी के डर का इस्तेमाल भी उसने जंगल बचाने के लिए किया। फौजी को गुजरे आज 7 साल हो गए हैं। लेकिन एड्स के खौफ से गंगोलीहाट में बसाया उसका जंगल आज भी लहलहा रहा है। एड्स से लड़ते हुए बसाया गया यह जंगल एड्स के खिलाफ लड़ाई का प्रतीक है।
ये कहानी पिथौरागढ़ के गंगोलीहाट के एक ऐसे युवक की है जो एड्स से लड़ता हुआ इस दुनिया से रुखसत हुआ। अपनी मौत से पहले उसने अपनी बेटी और पत्नी को दुनिया से जाते हुए देखा। करीब 15 साल पहले यह युवा जब सेना में भर्ती हुआ था तो भविष्य के सुनहरे सपने सामने थे। लेकिन नौकरी और जीवन की खुशियां केवल पांच साल साथ रहीं। इसके बाद जो हुआ वह मौत के दिन गिनने की शुरुआत थी। कोई भी आदमी टूट सकता है लेकिन फौजी तो फौजी था। 2001 में नियमों के चलते फौजी को घर भेज दिया गया, चारों तरफ निराशा थी। गांव में लोगों के लिए एड्स एक महामारी की तरह थी। इन सबके बीच फौजी को जिद थी कि वे एड्स के साथ जितने दिन जीयेगा उनका इस्तेमाल एक बेहतर कल के लिए करेगा। यही वह वक्त था जब गंगोलीहाट के फुटशिल का जंगल लगातार काटा जा रहा था। गांव-गांव जाकर एड्स के खिलाफ जनजागरूकता फैला रहा फौजी रोज जंगल को कटते हुए और एड्स से लोगों के डर को समझ रहा था। इसी डर का इस्तेमाल फौजी ने फुटशिल के जंगल को बचाने में किया। वन पंचायत की मदद से उसे जंगल की पहरेदारी का जिम्मा मिला। फौजी की लाख कोशिशों के बावजूद लोग जंगल लगातार काट रहे थे। इसके बाद फौजी ने लोगों को एड्स का डर दिखाया। जंगल बचाने को निकला फौजी जेब में ब्लेड रखने लगा। यही वह ब्लेड था जिससे फौजी लोगों को संक्रामक रोग फैलाने का खौफ दिखाता। वह लोगों से कहता कि यदि किसी ने जंगल में पेड़ों को हाथ लगाया तो वह ब्लेड में उन्हें अपना खून लगाकर संक्रमित कर देगा। इस भय से लोगों ने जंगल काटने बंद कर दिए। फौजी 2005 तक जिंदा रहा, तब तक उसकी ब्लेड का डर भी लोगों के दिल में रहा। फौजी जब नहीं रहा तो लोगों को उसका उद्देश्य समझ में आया। उसी की सीख और प्रेरणा थी कि आज फुटशिला का जंगल लहलहा रहा है।
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