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गेरू-बिस्वार के ऐंपण पर भारी पड़ रहे स्टीकर्स

Nainital

Updated Tue, 13 Nov 2012 12:00 PM IST
भीमताल। उत्तराखंड की लोक कलाओं में विलुप्त होती ऐंपण की कला को जिंदा रखने में दीपावली के त्योहार का सबसे ज्यादा महत्व है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से गेरू और बिस्वार से बनने वाले ऐंपण का स्थान प्लास्टिक के स्टीकर्स के रूप में छपे छपाए ऐंपणों ने ले लिया है। दीपावली के कई दिन पहले से ही द्वार, देहरी, मंदिर, आंगन, फर्श, रसोई घर की दीवारों में लक्ष्मी चौकी का अंकन एवं लक्ष्मी के पद चिह्न बनाने का प्रचलन आज भी बदस्तूर जारी है।
उल्लेखनीय है कि हिंदू धर्म में साल भर में कई त्योहार मनाए जाते हैं लेकिन दीपावली पर्व एकमात्र ऐसा त्योहार है जब प्रत्येक घर आंगन में पहाड़ की लोक कला ऐंपण के रूप में नजर आती है। पारंपरिक लोक चित्रकार बृजमोहन जोशी बताते हैं कि दीपावली में गेरू और बिस्वार (चावल के आटे का घोल) की सहायता से बनने वाली लक्ष्मी चौकी, लक्ष्मी के पदचिह्न तथा गन्ने की सहायता से कांसे की थाली में लक्ष्मी का अंकन किए जाने की परंपरा वर्षों पहले से चली आ रही है। मान्यता है कि दीपावली के दिन घर आंगन में बनाए गए पदचिह्नों से ही महालक्ष्मी घर में प्रवेश करती है। उत्तराखंड में आज भी दीपावली पर्व तीन रूपों में मनाया जाता है। पहला छोटी दीपावली को बाल्यकाल कहा जाता है जो कोजागर पूर्णिमा को होती है। दूसरा महालक्ष्मी पूजा के दिन दीपावली की यौवन अवस्था तथा दीपावली के एक पखवाड़े बाद मनाई जाने वाली बूढ़ी दीपावली दीपावली की वृद्धावस्था को इंगित करती है। जोशी बताते हैं कि हरिबोधनी एकादशी को ओखल, सूप एवं भूमि में गेरू और बिस्वार की सहायता से सूईयों की आकृति का अंकन किया जाता है और सूप के पृष्ठ भाग में लक्ष्मी नारायण का अंकन किया जाता है। इस तरह जहां एक ओर दीपावली लोक चित्रकला को जीवंत रखे हुए है। इधर पिछले कुछ वर्षों से लोग गेरू और बिस्वार के बजाए प्लास्टिक के स्टीकर्स में छपे ऐंपण भी घरों में लगाने लगे हैं। बाजार में पांच से दस रुपये के बीच छोटे बड़े कई तरह के ऐंपणों वाले स्टीकर्स मौजूद हैं। जिनकी खूब बिक्री हो रही है। बावजूद आज भी बड़े बुजुर्ग गेरू और बिस्वार के ऐंपणों को ही शगुन मानते हैं।
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