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पटाखे जलाएंगे या सेहत बचाएंगे:

Nainital

Updated Thu, 08 Nov 2012 12:00 PM IST
हल्द्वानी। दीपावली यानि दीये जलाकर अंधेरा मिटाने और उल्लास के साथ खुशियां मनाने का पर्व। यहां तक ही बात रहे तो अच्छा लगता है, लेकिन खुशियां दीपों के बजाए जिन पटाखों में दिखती हैं उन असंख्य पटाखों का धुंआ अपने पीछे खतरनाक जहर छोड़कर जाता है। ईको फ्रेंडली दिवाली की बातें खूब होती हैं, पर गेट-वे ऑफ कुमाऊं में पर्यावरण के सीमित दोस्तों पर आतिशी भारी पड़ती है। हफ्ते से पखवाड़ा लग जाता है पटाखों का धुंआ छंटने में और सोचिए ये धुंआ आपकी सेहत पर कितना जहरीला डंक मारता होगा।
दिवाली के दिन शहर में मापे जाने वाले प्रदूषण में स्वीकार्र्य सीमा से चौगुनी वृद्धि इस बात का प्रमाण है। वर्ष के 364 दिनों में प्रदूषण की अपेक्षा साल के इस एक दिन में वायु प्रदूषण का स्तर सबसे ज्यादा रहता है। बीते दो वर्षों में ठीक महालक्ष्मी पूजन के दिन होने वाले आतिशी नजारे के बाद हल्द्वानी में वायु प्रदूषण जांच मशीन ने जो प्रदूषण कैद किया है, वह इस शहर की सेहत के लिए ठीक नहीं।
वायु में धूल तथा अन्य कणों का स्तर रेस्पाइरेबल सस्पेंडेड पार्टिकुलर मैटर (आरएसपीएम) और सस्पेंडेड पार्टिकुलर मैटर (एसपीएम) में मापा जाता है। आरएसपीएम की स्वीकार्यता 100 माइक्रोग्राम घन मीटर और एसपीएम की 200 माइक्रोग्राम घनमीटर है। धूल के साथ धुंए का स्तर भी सामान्य दिनों की अपेक्षा दीयों के त्यौहार के दिन करीब दो गुना तक बढ़ता है। पर्यावरणविद् यह मानते हैं कि आतिशी पर्यावरण के लिए सबसे अधिक जहरीली है। जबकि चिकित्सकों का कहना है कि आतिशबाजी के बाद फैलने वाले धुंए के प्रभाव से खतरनाक बीमारियां जन्म लेती हैं। श्वास, दमा के मरीजों के अलावा अस्पतालों में भर्ती मरीजों पर यह धुंआ गंभीर असर डालता है तो साथ में स्वस्थ मनुष्य को भी अस्वस्थ बनाता है। ...तो तय कीजिए आप आतिशी चाहते हैं या शहर को जहरमुक्त रखने का संकल्प लेते हैं।


इंसेट

ये है दो वर्षों की दीवाली का वायु प्रदूषण
वर्ष आरएसपीएम एसपीएम
2010 298.3 376.2
2011 300.0 400.1
(स्वीकार्य सीमा ऊपर लिखी गई है। स्रोत: प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड)
इंसेट

धुंए का प्रभाव
हवा में धुंए का प्रभाव सामान्य दिनों में 20 से 25 माइक्रोग्राम घन मीटर तक रहता है, लेकिन दिवाली में पटाखों से निकलने वाला धुंआ इस आंकड़े को 50 से 55 माइक्रोग्राम घन मीटर तक लेकर जाता है। यह स्थिति तब तक रहती है जब तक धुंआ छंटता नहीं। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी पीके जोशी मानते हैं कि आतिशबाजी शहर को सालभर की तुलना में एक ही दिन में सर्वाधिक प्रदूषित करती है। यदि लोग जागरूक हों तो प्रदूषण कम हो सकता है। वहीं पर्यावरणविद् प्रो. प्रभात उप्रेती का मानना है कि अगर पर्यावरण को बचाना है तो आतिशबाजी को खत्म करने का दृढ़ संकल्प लेना होगा।
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