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एकलव्य जैसा मेहंदी, कलाम जैसा मकसद

Nainital

Updated Tue, 23 Oct 2012 12:00 PM IST
हल्द्वानी। गुरु और शिष्य के संबंध की बात आए तो द्रोणाचार्य और एकलव्य का नाम आना लाजमी है। ठीक इसी तरह किसी गरीब बच्चे का सपना जब वैज्ञानिक बनने का हो तो अब्दुल कलाम का नाम भी याद आता है। रामपुर रोड स्थित समता योग आश्रम गली के प्राथमिक विद्यालय में कक्षा तीन में पढ़ने वाले मेहंदी हसन में एकलव्य जैसे गुण भी हैं और अब्दुल कलाम आजाद जैसे सपने भी। आवश्यकता आविष्कार की जननी होती है। यह बात नन्हा मेहंदी भी समझता है। तभी तो उसने गर्मी में पसीने से तर अपनी शिक्षिका के लिए ऐसा पंखा तैयार कर डाला जिसे देख हर कोई आश्चर्य में पड़ जाता है।
प्रतिभा से अमीर मेहंदी हसन पैसे से बहुत गरीब है। वह जिस स्कूल में पढ़ता है उसकी हालत भी बहुत अच्छी नहीं। किराए के भवन में चलने वाले इस प्राइमरी स्कूल में बिजली, पानी और शौचालय किसी की सुविधा नहीं है। बरसाती की सड़ी गर्मी में मेहंदी हसन ने अपनी मैडम (टीचर) जया बिष्ट को गर्मी से परेशान देखा तो उसके मन में बिना बिजली से चलने वाला पंखा बनाने की धुन सवार हो गई और अगले दिन ऐसा पंखा तैयार कर स्कूल ले आया कि जिसे चलाने के लिए बिजली की जरूरत ही नहीं थी। टीचर ने भी मेहंदी हसन का पंखा स्कूल में काफी सहेज कर रखा है तथा जो भी स्कूल में आता है उसे दिखाने को तत्पर हो जाती हैं।
नन्हे वैज्ञानिक मेहंदी हसन से जब इस पंखे को तैयार करने के बारे में पूछा गया तो उसने बताया कि गत्ते का रोल तैयार कर उसमें टीन काटकर तीन पंख बनाए। कबाड़े से बटन निकाला और सर्किट तैयार दो बेटरी से चलने वाला पंखा तैयार कर दिया। उसे इस तरह का पंखा बनाने का आइडिया टीवी देखकर आया। पंखा बनाने में उसे केवल एक घंटे का वक्त लगा। वह कहता है कि जीवन में पढ़ लिख कर एक बड़ा वैज्ञानिक बनना चाहता है लेकिन पिता की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है जिसके चलते उसका यह सपना पूरा हो पाएगा। उसके पिता महबूब अली रिक्शा चलाकर परिवार पालते हैं और इंद्रानगर में रहते हैं। जया बिष्ट कहतीं कि अगर इस बच्चे को कोई सहारा देने वाला मिल जाए तो यह भी एक दिन नाम रोशन कर सकता है। लेकिन हमारे समाज का दुर्भाग्य है कि बेसहारों की मदद करने वाले कम ही मिलते हैं।
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