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जिंदगी का सच्चा एहसास कराती हैं गजलें

Nainital

Updated Fri, 05 Oct 2012 12:00 PM IST
हल्द्वानी। ‘चिट्ठी आई है, आई है चिट्ठी’... इस गजल को जब पंकज उदास के सुर मिले थे तो अपनों की याद में कागज के एक टुकड़े पर चली कलम से अपनत्व का वास्तविक एहसास होता था। चिट्ठी भले ही अब इतिहास बन चुकी हो, मगर उस दौर का गीत आज भी जिंदा है चिट्ठी की याद दिलाने के लिए। पंकज उदास ने किन भावनाओं साथ इस गजल को अपने कंठ की आवाज दी होगी, ये उनकी बेटी रेवा से पूछिए। जो पिता के इस गीत की आज भी कायल हैं। रेवा उदास के लिए गजल सिर्फ एक शब्द नहीं, बल्कि जीवन के हर पहलू को समझने की कला है।
बृहस्पतिवार को हल्द्वानी में एक मुलाकात में रेवा की गजल के प्रति दीवानगी दिखी तो इसके चाहने वालों की संख्या में कमी का दर्द भी। उनका कहना था कि गजल को उदासी भरा समझने वालों के भीतर भावना नहीं होती। क्योंकि गजल में भावनाओं का मिलन है। वो कभी खुशी का एहसास कराती है तो कभी दर्द का। रेवा ने गजल गायन को अपना लक्ष्य नहीं बनाया, लेकिन पिता को वह अपना आदर्श मानती हैं। गजल को गुनगुनाती हैं, चाहे उसे पिता की तरह लय और ताल न मिले। रेवा का कहना है कि मैंने मीडिया के क्षेत्र में अपना कैरियर बनाने का लक्ष्य रखा था और उसमें मुझे कामयाबी भी मिली। मैं गजल सुनती हूं तो एकाग्रता के साथ, क्योंकि बगैर एकाग्रता के गजल सुनने का कोई फायदा नहीं।
आज के दौर में आयटम गीतों की बढ़ती डिमांड और गजल के कद्रदानों की कमी को वह बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण मानती हैं। रेवा का कहना है कि जो वर्षों से गजल गायन कर रहे हैं उन्हें भी आज कोई नहीं पूछता। बदलता दौर बेशक बहुत कुछ बदलता है, लेकिन गजल से मोहभंग होने से यह लगता है कि जिस तरह से पिता की गजल में समाई चिट्ठी इतिहास बनी, ठीक उसी तरह गजल भी अतीत का हिस्सा बन जाएगी। पिता ने गजलों के बूते तो प्रसिद्धी पाई, उसे लेकर आप कैसा महसूस करती हैं? इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि मैंने अपनी पहचान जरूर बनाई है, लेकिन मुझे पिता की वजह से जो पहचान मिली, मैं आज भी उसी में जीती हूं। रेवा के परिवार में माता-पिता के अलावा बड़ी बहन नाया उदास है जो इंवेट से जुड़ी हुई है। रेवा कहती हैं कि मैं गजलें सुनती थी, सुनती रहूंगी, लेकिन चिट्ठी आई है गजल हमेशा के लिए मेरे दिल-दिमाग में कैद रहेगी।
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