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तिब्बत सीमा पर शिंगलु परंपरा से बच रहा जंगल

Nainital

Updated Mon, 24 Sep 2012 12:00 PM IST
हल्द्वानी। मानसून में सरकारी पर्व आता है, जिसमें पौधे लगाने और वृक्षों को बचाने के तमाम वादे, दावे और योजनाओं का पिटारा खोला जाता है। पर इन तमाम हलचलों और आंकड़ों की कलाबाजी से दूर तिब्बत सीमा से सटे कुछ ऐसे इलाके हैं, जहां कोई सरकारी इमदाद नहीं बल्कि एक परंपरा जंगल संरक्षित करने में जुटी है। भोटिया समाज की इस परंपरा को शिंगुल या शे-रोयाकहा जाता है। इसमें वनों को देवों को अर्पित कर दिया जाता है। शिंगुल के तहत जोहार, दारमा घाटियों में सैकड़ों हेक्टेयर जंगल सुरक्षित ही नहीं हुआ है बल्कि उसकी सघनता में भी वृद्धि हुई है।
वन विभाग ने पिथौरागढ़ वन प्रभाग का वर्किंग प्लान (इसमें वनों को बढ़ाने की योजना बनती) बनाया है। इसके तहत वनाधिकारी तिब्बत सीमा तक वनों के बारे में आंकड़े और जानकारी जुटाने को गये। इस दौरान तिब्बत और नेपाल सीमा के पास की घाटियों में सालों से चली आ रही शिंगलु परंपरा के बारे में विस्तार से पता चला। इस परंपरा के तहत वनों को देवों के नाम पर चढ़ाया जाता है। जिन वनों को देवों को चढ़ाया जाता है, उनमें मुख्य रूप से रागा, नाग देवता, नंदा देवी, सडस्यी और गबला जैसे स्थानीय देवता हैं। इसके तहत घाटियों में जंगल लहलहा ही नहीं रहे, बल्कि दूसरी जगहों की तुलना में वनों की सघनता भी बढ़ी है। जोहार घाटी में मरतोली में लगभग 60 हेक्टेयर, भुजानी शिंगुल बुर्फू में 180, बिज्जू 70 हेक्टेयर, टोला में 61, मिलम में 40 हेक्टेयर वन इस परंपरा के जरिए सुरक्षित हैं। दारामा घाटी के तिदांग के बोबासिड देववन भी प्रसिद्ध रहा है।
डीएफओ वर्किंग प्लान मनोज चंद्रन कहते हैं कि देववन का होना प्रत्येक गांव की महिमा थी। स्खलन जैसी दैवीय आपदा से बचाने को गांवों के निकट ऐसे देववनों को संरक्षित किया गया है। पिथौरागढ़ के दूसरे इलाके मदमहेश, भूरखासिन, खंडेलनाथ, कलछिन जैसे दूसरे भी देव वन हैं, जिनको देवों को चढ़ाया गया है, यहां पर पेड़ काटना तो दूर की बात हैं, उसमें हथियार लेकर प्रवेश करना वर्जित होता है।

दूसरे देव वनों की मान्यता
हल्द्वानी। सतगढ़ (दस गांव), होकरा, लटेश्वर, हाट कालिका, लोहाथल, बरम, चूडियार आदि प्रसिद्ध देववन है। इन देववनों में विदोहन के कारण हुई दुर्घटनाओं को लेकर कई किवदंतियां प्रचलन में है, जिससे ग्रामीणों में पेड़ काटने को लेकर भय बना रहता है।

बुग्याल भी पवित्र
हल्द्वानी। वनों के अलावा बुग्यालों को भी स्थानीय जनता ने पवित्र होने की मान्यता दी है। इसमें रालम, बरजिगांग, लास्पा, के धाराबुन, सेम, नपल्च्यू के ह्या रोशे, जोलिंकोग आदि मुख्य है।
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