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शिकारियों के रहमोकरम पर बाघ

Nainital

Updated Sat, 22 Sep 2012 12:00 PM IST
हल्द्वानी। बाघ बचाने के नाम पर अरबों रुपये फूंके जा रहे हैं। बड़े-बड़े होर्डिंग्स, बैनर, पोस्टरों से बाघ बचाओ अभियान के अलावा महेंद्र सिंह धोनी जैसे कीमती क्रिकेटर को ब्रांड एंबेसडर बनाया गया है। कई एनजीओ भी बाघों के नाम पर लाखों डकार जा रहे हैं। इसके बावजूद बाघ जिंदा हैं शिकारियों के ही रहमोकरम पर। वह जब और जहां चाहें आसानी से बाघ को ढेर कर सकते हैं। क्योंकि धरातल पर बाघों को बचाने वाले कर्मचारियों के लिए वन विभाग के पास बजट ही नहीं है। हालत यह है कि वेतन न दे पाने के कारण जंगलों की सुरक्षा के लिए तैनात पूर्व सैनिकों को हटा दिया गया है। उधारी के पेट्रोल से दौड़ रहे वाहन कभी भी बंद हो सकते हैं। पैसा न होने के कारण जंगल को जाने वाले गश्ती रास्ते गुम हो गए हैं।
सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम न होने के कारण जंगलों में एक के बाद एक शिकार हो रहे हैं। बाघ, गुलदार, हाथी जैसे वन्यजीव और साल, शीशम जैसे बेशकीमती जंगलों से भरे तराई पूर्वी वन प्रभाग की ही बात करें तो नेपाल सीमा तक 82 हजार हेक्टेयर में फैले इस डिवीजन का खर्च करीब 2 करोड़ रुपये है। लेकिन मिले हैं केवल पांच लाख रुपये। पैसों की कमी के कारण ही गश्त में तैनात दस एक्स सर्विस मैन को हटा दिया गया। इनको चार महीने का वेतन भी नहीं दिया गया था। वाहन उधारी के पेट्रोल से चल रहे हैं। दो लाख का कर्ज अभी देना है। जंगल जाने वाले रास्ते सुधारने को भी पैसा नहीं है। हरियाली को लेकर दावे और फोटो खींचाने वाले नेता भी पौधरोपण के लिए भी राशि जुगाड़ नहीं करा सके हैं, हल्द्वानी शहर से लेकर जंगल तक में पौध रोपण उधार में हो रहा है। 70 लाख (पौधे, श्रमिक, पानी) का पौध रोपण जुगाड़ और उधार में हुआ है। हाईटेक शिकारियों की मुखबिरी के लिए केवल पांच हजार रुपया दिया गया है। यह स्थिति करीब हर प्रभाग में है।
जान पर खेलने वालों की नहीं कद्र
हल्द्वानी। जंगल की आग को लेकर खूब हल्ला मचता है, अपनी जान पर खेलकर वनाग्नि को काबू करने वाले फायर वॉचर को दो सालों से कोई पैसा ही नहीं दिया गया है। उनका करीब 15 लाख का उधार है। जबकि तराई पूर्वी डिवीजन से हर साल सरकार के 50 करोड़ से ज्यादा का राजस्व मिलता है।
मुआवजा को भी राशि नहीं
हल्द्वानी। जंगलात वन्यजीवों के हमले में मारे गये लोग और फसलों के नुकसान में मुआवजा देता है। पर राशि नहीं होने इसके प्रभावित अभी कार्यालयों को चक्कर काट रहे हैं। इस बाबत डीएफओ पीके पात्रों का कहना है कि बजट न मिलने से काफी दिक्कत आ रही है, उसे शासन में रखा गया है।
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