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अंग्रेजों से जीते, व्यवस्था से हार गए देवीलाल

Nainital

Updated Wed, 15 Aug 2012 12:00 PM IST
नैनीताल। स्व. देवीलाल साह वह नाम है, जिसने देश की आजादी के लिए अन्य वीरों की तरह अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। अंग्रेजों के जुल्म सहे। कई बार जेल गए। नमक आंदोलन में भी भागीदारी की। आखिर देश आजाद हुआ और सरकार ने ऐसे वीरों की तरह ही मल्लीताल (नैनीताल) निवासी देवीलाल को भी सम्मानित किया। देवीलाल को सरकार ने बतौर इनाम जमीन भी भेंट की लेकिन उनके जीते जी उन्हें इसका अधिकार नहीं मिल सका। सरकारी इनाम को लेकर उन्होंने अपने अंतिम समय में परिजनों से इच्छा भी जताई थी कि वह ईनाम पर अधिकार हासिल करें। इसे विडंबना ही कहेंगे कि उनके निधन के बाद सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाते-लगाते अब स्व. देवीलाल की पत्नी और बच्चे थक चुके हैं और अपने कदम पीछे खींच लिए हैं। 70 वर्ष बाद भी जमीन पर हक नहीं मिलने के कारण यह परिवार सरकार और व्यवस्था से काफी नाराज है।
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्व. देवीलाल की पत्नी पदमा साह (85) अपने पति की वीरगाथा सुनाते हुए कहती हैं कि उन्होंने 1930 में नमक आंदोलन में भाग लिया था। अंग्रेजों के जुल्मों को सहते हुए वह छह माह बरेली जेल में बंद रहे। इसके बाद देवीलाल ने 1944 में देश की आजादी के लिए तल्लीताल से निकाले गए जुलूस में भी बढ़ चढ़कर भागीदारी की। वह बताती हैं कि एक रात देवीलाल देर रात से घर आए। उनके शरीर पर सिगरेट के जले और डंडों के निशान थे। जब उन्होंने पति की मरहम पट्टी की तो उन्होंने कहा था कि ‘देश की आजादी के बाद यह जख्म अपने आप भर जाएंगे।’ आखिर 1947 में देवीलाल का आजाद भारत का सपना सच हुआ। श्रीमती साह बताती हैं कि 1952 में तत्कालीन यूपी के मंत्री गोविंद बल्लभ पंत ने देवीलाल को राजनीति में आने का न्योता दिया लेकिन देवीलाल ने इसे ठुकरा दिया। इसी दौरान सरकार ने देवीलाल साह की वीरता को देखते हुए खरमासा (काशीपुर) में उन्हें 10 एकड़ जमीन बतौर ईनाम और मुआवजा देने की घोषणा की थी। जमीन मिली लेकिन उस पर आज तक कब्जा नहीं मिल पाया। श्रीमती पदमा ने पति के निधन के बाद अत्यधिक संघर्ष कर अपने तीन बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाई। उन्होंने पूर्व स्वतंत्रता सेनानी डूंगर सिंह बिष्ट का आभार जताया कि उनके प्रयासों से उन्हें पति की पेंशन की सुविधा मिलनी शुरू र्हुई। स्व. देवीलाल के पुत्र और कुविवि के पूर्व कार्यालय अधीक्षक प्रकाश लाल साह बताते हैं कि 1965 में जब वह 21 वर्ष के थे, तब उनके पिता स्व. साह उन्हें काशीपुर स्थित अपनी जमीन दिखाने ले गए थे। तब उन्होंने कहा था कि ‘इस जमीन पर हमारा अधिकार है और यह तुम्हें जरूर हासिल करना है।’ प्रकाश साह कहते हैं कि 19 सितंबर 1967 में उनके पिता का निधन हो गया। जमीन पर हक पाने के लिए साह परिवार और जमीन पर कब्जा करने वाले पितांबर दत्त जोशी के बीच न्यायालय में मुकदमा चला। कोर्ट के चक्कर लगाकर थक चुके प्रकाश ने शासन से गुहार भी लगाई लेकिन मामला जस का तस है।
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