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दुश्मन पिरुल बन रहा रोजगार का साथी

Nainital

Updated Sat, 21 Jul 2012 12:00 PM IST
हल्द्वानी। पहाड़ों में मुसीबत माने जाने वाले पिरुल ने नई संभावनाओं के दरवाजे खोले हैं। एक साल में ग्रामीणों ने जिसमें अधिकांश महिलाएं थी, पिरुल बेचकर 15 लाख की आय अर्जित की है।
पर्वतीय क्षेत्रों में वनाग्नि भड़कने का एक कारण पिरुल ही होता है। ग्रामीणों के अनुसार जहां पर पिरुल गिरता है, उस जगह पर कोई दूसरी वनस्पति भी नहीं उगती। इसकी खाद भी नहीं बनती है और इस पर फिसलने का खतरा बना रहता है। इससे बचने के लिए वन विभाग ने पिरुल के इस्तेमाल की योजना बनाई है। इसमें एक प्लान निजी संस्था सुयश उद्योग प्राइवेट लिमिटेड ने कोयले की तरह ज्वलनशील बिक्रेट बनाने की योजना का प्रस्ताव दिया। तय हुआ कि पहाड़ों से वन विभाग पिरुल ले जाने की अनुमति देेगा, जो भी ग्रामीण इसे करेंगे उन्हें एक रुपये प्रति किलो के हिसाब से भुगतान होगा। अब इस योजना का शुरुआती लाभ दिखने लगा है। करीब एक साल में इस निजी संस्था ने ओखलकांडा, शीतलाखेत, रानीखेत, पैठान, बल्दियाखान से 15 हजार कुंतल पिरुल एकत्र किया। इसके बदले महिलाओं को 15 लाख का भुगतान किया गया है। संस्था के एमडी कुमार काबरा कहते हैं कि अगर वनाग्नि में पिरुल जला नहीं होता, तो करीब 40 हजार टन पिरुल के इस्तेमाल का लक्ष्य था। हमारे काम में करीब 400 लोग जुड़े हैं। वह औसतन प्रतिदिन 250 से 300 रुपये एक दिन में आय कर लेती हैं।

कैसे बनता बिक्रेट
पिरुल को जंगल से एकत्र कर महिलाएं रोड तक लाती हैं। जहां पर मशीन ब्लाक बनाकर ट्रक पर लोड कर किच्छा स्थित फैक्ट्री में पहुंचाते हैं। यहां पिरुल में धान की भूसी, बुरादा आदि को मिला कर कंप्रेसर मशीन में डाल दिया जाता है। इसके बाद एक निश्चित आकार में बिक्रेट तैयार होकर मिल जाता है।

कहां-कहां पर इस्तेमाल
लालकुआं स्थित स्लीपर फैक्ट्री से लेकर रुद्रपुर, हरिद्वार की फैक्ट्रियों में ब्रिकेट की डिमांड है। श्री काबरा कहते हैं कि जहां पर ब्रायलर हैं, वहां इसकी खपत है। अपर प्रमुख वन संरक्षक शोध एवं प्रबंधन कहते हैं कि वन विभाग ने भी इस प्रोडक्ट को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठाये हैं।

बिजली बनाने का प्रस्ताव ठंडे बस्ते में
वैकल्पिक ऊर्जा के लिए पिरुल से बिजली बनाने की योजना बनी। वन विभाग और उरेडा ने इस प्रोजेक्ट के लिए मेहनत भी की। इसके बाद पांच कंपनियों ने डीपीआर भी शासन को सौंपी थी। लेकिन, बाद में योजना ही ठंडे बस्ते में चली गई।
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