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पटाखों के प्रचलन के पीछे कोई शास्त्रीय आधार नहीं

Haridwar

Updated Mon, 05 Nov 2012 12:00 PM IST
हरिद्वार। दीपावली का त्योहार आनंद का प्रतीक है। सभी का जीवन आनंद से परिपूर्ण हो इसलिए दीप जलाए जाते हैं, दीप जलाने से अंधकार का नाश होता है। दीपावली के त्योहार के दिन दूसरों को भी आनंद का अनुभव हो, उपहार देकर और मिलजुलकर दीपावली मनाकर हम ऐसे काम करते हैं। लेकिन हमारे किसी कृत्य से दूसरों को दुख पहुंचे क्या यह पाप नहीं है। आनंद और उत्साह के लिए पटाखों का इस्तेमाल करने को संत समाज सही नहीं मानता।
सतं समाज की मानें तो पटाखे फोडने के पीछे कोई भी शास्त्रीय आधार नहीं है। यह एक अनुचित लेकिन प्रचलित प्रथा बन गई है। पटाखे फोडने से दूसरों को आनंद मिलता है, ऐसा बिल्कुल नहीं है। बल्कि दूसरों का कठिनाई होती है। ऐसी प्रथाओं का हम अनुकरण क्यों करें। इसके विपरित ऐसी प्रथाओं के कारण लोग अपने त्योहारों से त्रस्त हो गए हैं और त्योहार के विषय में भ्रांत धारणा बन गई है। इन्हें दूर कर त्योहार मानना वास्तव में खरी दीपावली है।

दीपावली पर पटाखों का इस्तेमाल फिजूलखर्ची है, शास्त्रों में इस प्रचलन का कोई उल्लेख नहीं है। पटाखों का इस्तेमाल पर्यावरण को नुकसान पहुंचाता है। लोगों की सेहत पर विपरीत असर डालता है। हर साल कई लोग इससे चोटिल होते हैं कई अपनी जान गंवाते हैं। जितने पैसे पटाखों पर खर्च होते हैं उनसेहर साल अस्पताल, स्कूल तथा अनाथालय खोले जा सकते हैं।
- बाबा हठ योगी, प्रवक्ता अखिल भारतीय संत समिति

वातावरणीय सात्तिवकता होती है नष्ट
हरिद्वार।
पटाखों के धुएं और शोर के कारण वातावरण की सात्विकता नष्ट होकर रज और तम की मात्रा में वृद्धि होती है। जबकि यज्ञ-हवन के माध्यम से वातावरण को शुद्ध करना चाहिए। त्योहारों के माध्यम से सतगुणों को बढ़ाने का प्रत्यन्न करना चाहिए। लेकिन हम पटाखों के माध्यम से दैवी शक्तियों को आमंत्रित करने की बजाय अनिष्ट शक्तियों को आमंत्रित करते है। ऐसे में पटाखों न फोड़ने का निश्चय करना चाहिए।

पटाखों के नुकसान-
- शारीरिक चोट आना, जान का जोखिम
- छोटे बच्चों और वृद्ध जानों को दिक्कत
- पटाखों के धुएं से सांस लेने में कठनाई
- खतरनाक गैसों से पर्यावरण पर असर
- पटाखों पर बड़ी मात्रा धननाश का होना
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