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अस्पताल ‘बीमार’, कैसे मिले उपचार

Haridwar

Updated Fri, 19 Oct 2012 12:00 PM IST
हरिद्वार। उपनगरी ज्वालापुर की करीब डेढ़ लाख आबादी पर एकमात्र सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र बना है। लेकिन, इस अकेले सरकारी अस्पताल में मरीजों का इलाज कराना नामुमकिन है, वजह अस्पताल खुद ही बीमार पड़ा है। आश्चर्य की बात तो यह है कि ज्वालापुर क्षेत्र में 40 से अधिक पीलिया के मामले सामने आ चुके हैं, जबकि अब तक इससे तीन अकाल मौत के मुंह में जा चुके हैं। बावजूद इसके, स्वास्थ्य विभाग अस्पताल की सुध लेने को तैयार नहीं है।
ज्वालापुर क्षेत्र में तरह-तरह की बीमारियां फैल रही हैं। खासकर, कड़च्छ आदि मोहल्लों में पीलिया के कई मामले सामने आ चुके हैं। स्क्रब टायफस और डेंगू जैसी जानलेवा बीमारी के मामले भी मिले हैं। लेकिन, क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाओं का बुरा हाल है। हालत यह है कि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में खून जांच तक की सुविधा नहीं है। पैथोलॉजी लैब के लिए कोई टेक्नीशियन समेत अन्य स्टाफ भी तैनात नहीं है। सब पैथोलॉजी के नाम पर सिर्फ टीबी का बलगम टेस्ट होता है। ऐसे में, खून जांच के लिए मरीजों को 10 किमी दूर स्थित जिला अस्पताल की दौड़ लगानी पड़ती है या फिर प्राइवेट सेंटरों में महंगी जांच कराने को बाध्य होना पड़ता है। एक्सरे मशीन नहीं है। अल्ट्रासाउंड मशीन है, तो विशेषज्ञ डॉक्टर तैनात नहीं है। वैकल्पिक व्यवस्था के तौर पर रेडियोलॉजिस्ट डा. मनीष दत्त सप्ताह में तीन दिन मंगलवार, बृहस्पतिवार और शनिवार को यहां बैठते हैं, लेकिन उनकी अन्यत्र ड्यूटी के चलते कई बार अस्पताल में अल्ट्रासाउंड भी नहीं हो पाते।

इनसेट
दिन ढलते ही इमरजेंसी बंद
सीएचसी ज्वालापुर की इमरजेंसी सेवाएं दिन ढलते ही बंद हो जाती हैं। पिछले दिनों से ज्वालापुर में पीलिया के कई मामले सामने आए तो डीएम ने इमरजेंसी सेवाएं 24 घंटे खुली रखने के निर्देश दिए थे, मगर इन आदेशों पर भी अमल नहीं हो रहा है और सुबह आठ से दो बजे ओपीडी समय तक इमरजेंसी भी चलती है। उसके बाद ताला लटक जाता है।

अस्पताल 30 बैड का, काम डिस्पेंसरी जैसा
ज्वालापुर का सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र सिर्फ नाम का है। दरअसल, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से इसे सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र का दर्जा तो दिया गया, लेकिन शासन स्तर पर अभी भी अस्पताल को सीएचसी बनाए जाने का मामला लटका पड़ा है। लिखा पढ़ी में अब इसे सीएचसी माना जाता है। अस्पताल में 30 बैड उपलब्ध हैं। महिला चिकित्सालय है और प्रसव की सुविधा भी। लेकिन चिकित्सकों समेत अन्य स्टाफ का टोटा है। ऐसे में संसाधन होने के बाद भी स्वास्थ्य सेवाएं पीएचसी स्तर की ही हैं।

कोट
हमारे पास पीएचसी स्तर का पर्याप्त स्टाफ है। लेकिन, सीएचसी स्तर की सेवाएं नहीं हैं। पर्याप्त संसाधन भी हैं, लेकिन सीएचसी की जरूरत के हिसाब से डाक्टर और स्टाफ की कमी है। फिर भी मरीजों को बेहतर सुविधाएं देने के प्रयास किए जाते हैं।
- डा. दिवाकर मिश्रा, प्रभारी चिकित्साधिकारी।
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