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लड़कर मिला महिला परिसर, अब अधिकार की बारी

Haridwar

Updated Mon, 10 Sep 2012 12:00 PM IST
हरिद्वार। गुरुकुल कांगड़ी विवि की ओर से हरिद्वार में महिला परिसर अपनी मर्जी से नहीं खोला गया था। बल्कि इसके लिए शहर के लोगों ने लंबी लड़ाई लड़ी थी। शहर के लोगों ने गुरुकुल में लड़कियों के लिए सहशिक्षा का अधिकार मांगा था। दबाव में आए गुरुकुल प्रबंधन ने सहशिक्षा का अधिकार तो नहीं दिया लेकिन हरिद्वार में महिला परिसर की स्थापना जरुर हुई। अब फिर से लड़कियों को मतदान के अधिकार के लिए उसी तरह के संघर्ष की जरुरत आन पड़ी है।
स्वामी श्रद्धानंद द्वारा वर्ष 1902 में गंगा पार कांगड़ी ग्राम में बसाए गए गुरुकुल को डीम्ड विश्वविद्यालय की मान्यता 1962 में मिली थी। उससे पहले गुरुकुल की व्यवस्था आर्य प्रतिनिधि सभाएं किया करती थी। जैसे-जैसे आर्य प्रतिनिधि सभाओं का विभाजन हरियाणा, दिल्ली और पंजाब की सभाओं के बीच होता गया, गुरुकुल राजनीति का शिकार बनता गया। डीम्ड विवि का दर्जा प्राप्त कर जब अनुदान आयोग से शत प्रतिशत धन लिया जाने लगा, तब यह मांग भी बलवती होती चली गई कि स्त्रियों को भी गुरुकुल में शिक्षा प्रदान की जाए। स्वामी श्रद्धानंद ने हरिद्वार में पुरुषों एवं देहरादून में महिला परिसर की स्थापना अपने जीवन काल में की थी। तब गुरुकुल को कोई अनुदान सरकार से नहीं मिलता था।
वर्ष 1993 में पूर्व विधायक अम्बरीष कुमार एवं वरिष्ठ नेत्री डा. संतोष चौहान के नेतृत्व में सह शिक्षा का आंदोलन प्रारम्भ हुआ। इस आंदोलन ने वर्ष 1994 में जोर पकड़ लिया। उस समय प्रोफेसर शेर सिंह विवि के कुलाधिपति तथा डा. धर्मपाल कुलपति थे। आंदोलन बढ़ता गया और सह शिक्षा की मांग जोर पकड़ती गई। गुरुकुल के पुस्तकालय में जब सीनेट की बैठक हो रही थी, तब क्रुद्ध भीड़ ने पूरी सीनेट का घेराव कर लिया। उस समय भीड़ हिंसक हो उठी और लाइब्रेरी में घुस गई। कुर्सियां चली और हाथापाई हुई। भीड़ ने हिंसक प्रदर्शन के बाद अधिकारियों को बंधक बना लिया। तब जाकर सीनेट ने सह शिक्षा की मांग की जगह महिला परिसर का प्रस्ताव पारित किया। 1995 से लाल पुल के समीप जमीन लेकर अलग परिसर में स्त्री शिक्षा कन्या गुरुकुल के रूप में प्रारम्भ कर दी गई। डा. सुनृता विद्यालंकार महिला परिसर की पहली प्रभारी बनी।
तब से स्त्री परिसर को विवि ने सम्बद्ध कालेज का दर्जा प्रदान किया। यह सवाल जब अनुदान आयोग के समक्ष आपत्ति के रूप में उठा, तब कन्या गुरुकुल को घटक कालेज मान लिया गया। परिणाम स्वरूप दोनों ही संस्थाएं एक हो गई और छात्र संघ के चुनाव के लिए भी स्त्री परिसर अधिकृत हो गया। इसके बावजूद छात्राओं को मतदान का अधिकार अभी तक नहीं दिया गया है। यद्यपि अधिकारियों ने अब जाकर यह कहना शुरु कर दिया है कि सम्भवत: अगले वर्ष से छात्राओं को भी यह अधिकार मिल जाएगा।
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अलग से हों छात्राओं के चुनाव
हरिद्वार। स्वामी दयानंद स्त्री शिक्षा के प्रथम उन्नायक थे। वैदिक परम्परा के अनुसार शिक्षा के पक्षधर स्त्री और पुरुष के लिए अलग-अलग परिसरों की व्यवस्था करते आए हैं। स्वामी श्रद्धानंद ने स्त्रियों के लिए कन्या गुरुकुल की स्थापना देहरादून में की थी। जहां तक चुनाव का सवाल है गुरुकुल की भांति हरिद्वार के कन्या गुरुकुल में भी छात्राओं के चुनाव अलग से कराए जाने चाहिए। देहरादून के परिसर में भी छात्राएं चुनाव कर परिषद बनाती हैं। आर्य समाज स्त्री शिक्षा का विरोधी नहीं है।
-देवराज आर्य, छाया प्रधान-आर्य प्रतिनिधि सभा, उत्तराखंड
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संघर्षों से लिया था स्त्री परिसर
हरिद्वार। हरिद्वार की जनता ने लम्बे संघर्षों के बाद स्त्री परिसर हासिल किया था। छात्र संघ के चुनाव में छात्राओं को भी शामिल किया जाना चाहिए। यह घोर चिंता का विषय है कि विवि अनुदान आयोग से सारे लाभ लेने वाले गुरुकुल के अधिकारी आधी आबादी स्त्री को चुनाव अधिकार तक नहीं देना चाहते। उनके अधिकारों के लिए संघर्ष जारी रहेगा।
-अम्बरीष कुमार, पूर्व विधायक, हरिद्वार
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