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कुमाऊंनी भाषा के संरक्षण में जुटे साहित्यकार शूल

Champawat

Updated Wed, 26 Sep 2012 12:00 PM IST
चंपावत। कुमाऊंनी कविताओं के माध्यम से नशामुक्ति परिवेश आंदोलन को दिशा देने वाले जनकवि प्रकाश जोशी ‘शूल’ कुमाऊंनी भाषा के संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। उनकी ओर से कुमाऊंनी भाषा में लिखे गए पहले कथा संग्रह ‘ठेकुवा’ को खासी चर्चा मिल रही है। कुमाऊंनी भाषा में पद्य यानि कविताएं और संग्रह तो बहुत पहले से लिखे जा रहे हैं। लेकिन ठेकुवा कथा संग्रह कुमाऊंनी भाषा में लिखा गया सबसे पहला हास्य-व्यंग्य का गद्य संग्रह है। जिसके माध्यम से लेखक ने व्यक्तियों नहीं वरन आज की व्यवस्था पर करारी चोट की गई है।
इससे पूर्व हिंदी बाल काव्य संग्रह मेरे देश की माटी चंदन के अलावा प्रकाश जोशी शूल कुमाऊंनी काव्य संग्रह ‘मनै कि तीस’ एवं ‘जन पिया शराबा’ आदि पुस्तकें प्रकाशित कर चुके हैं। उनका कहना है कि जिस तरह दाल या सब्जी में हल्दी नहीं डाली जाती तब तक भले ही उसमें लाख मसाले डाल दिए जाए वह स्वाद नहीं मिल पाता है जो हल्दी डालने से मिलता है। ठीक उसी तरह से किसी भी भाषा का साहित्य तब तक अपूर्ण माना जाता है जब तक कि उस भाषा में हास्य-व्यंग्य विधा का लेखन न हुआ हो। वह कहते हैं कि चंद एवं कत्यूरी राजवंशों की ओर से विकसित की गई कुमाऊंनी बोली भाषा साहित्य को पूर्णता प्रदान करती है। पूर्व प्रधानाचार्य एवं कुमाऊंनी साहित्यकार कैलाश चंद्र लोहनी का कहना है कि कवि प्रकाश शूल की ओर से कुमाऊंनी भाषा को संरक्षण प्रदान किए जाने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास किया जा रहा है। जिसकी जितनी तारीफ की जाए कम है। वह कहते हैं कि साहित्य समाज का दर्पण होता है। यदि स्थानीय भाषा में साहित्य की रचना की जाए तो उसकी ग्राहता और अधिक बढ़ जाती है।
वर्तमान में नशामुक्त परिवेश एवं स्वच्छ पर्यावरण को लेकर अपनी कविताओं के माध्यम से जनजागरण अभियान चला रहे कवि शूल का कहना है कि कुमाऊंनी भाषा को शैक्षिक पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए। ताकि आने वाली पीढ़ी को भी अपनी भाषा एवं संस्कृति का समुचित ज्ञान हो सके।
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