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माना तो सबने गैरसैंण के पक्ष में है जनमत

Chamoli

Updated Fri, 28 Sep 2012 12:00 PM IST
कर्णप्रयाग। उत्तराखंड निर्माण से पहले ही आंदोलनकारियों ने राजधानी के लिए गैरसैंण घोषित कर दिया था। राज्य निर्माण के लिए गठित समितियों ने भी गैरसैंण की ही संस्तुति की थी। यहां तक की राजधानी चयन आयोग ने भी माना था कि राजधानी के लिए जनमत गैरसैंण के पक्ष में है। इन सबके बावजूद नौकरशाहों, राजनीतिज्ञों एवं पूंजीपतियों के गठजोड़ को पहाड़ी गैरसैंण नहीं भा रहा है। वे तो सुविधा के आइने में राजधानी को देखते हैं। जिस लिहाज से उन्हें देहरादून ही उपयुक्त लगता है। जिससे गैरसैंण राजधानी के लिहाज से गैर ही रह गया।
बेशक गैरसैंण एक भूगोल का नाम है। बावजूद इसके यह पहाड़ी राज्य की मूल अवधारणा का भी प्रतीक है। गैरसैंण केवल 1994 में उठे राज्य आंदोलन के दौरान ही राजधानी के लिए जुबां पर नहीं आया। पेशावर कांड के नायक वीर चंद्र सिंह गढ़वाली ने तो इस पर्वतीय प्रदेश की राजधानी के लिए गैरसैंण से सटे भराड़ीसैंण से लेकर दूधातोली तक फैले भू-भाग को वर्षों पहले घोषित कर दिया था। उन्होंने इस बाबत तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू हो भी पर्वतीय राज्य के औचित्य से लेकर उसकी राजधानी एवं संसाधनों को लेकर ब्ल्यू प्रिंट तक दिया था। बाद के वर्षों में उत्तराखंड क्रांति ने भी इस पर मुहर लगाई। उक्रांद ने 24 जुलाई 1992 को चंद्र सिंह गढ़वाली को याद करते हुए उनके नाम से चंद्रनगर को राजधानी घोषित करते हुए आधारशिला भी रखी थी। यही चंद्र नगर ही गैरसैंण है। भाजपा और कांग्रेस मैदानी मतदाताओं की नाराजगी मोल नहीं लेना चाहती थी। यही वजह रही कि उनके नेताओं के पहाड़ और मैदान में राजधानी को लेकर सुर बदलते रहे। अब गैरसैंण में कैबिनेट बैठक की तारीख भी आगे खिसक गई है। बावजूद इसके इस प्रस्तावित बैठक के बहाने गैरसैंण को राजधानी बनाने की मांग फिर चर्चा में है। गैरसैंण के पक्षधरों का कहना है कि पहाड़ की राजधानी पहाड़ में होनी चाहिए। गैरसैंण उसका प्रतिबिंब है। हालांकि राज्य गठन के 12 वर्षों बाद भी राजधानी को लेकर फैसला न कर पाना राज्य आंदोलनकारी शहीदों के सपनों को भुलाने जैसा ही है।

राज्य निर्माण एवं गैरसैंण राजधानी के लिए आंदोलनों का सफर
1936 में पहली बार श्रीनगर में जवाहर लाल नेहरू के समक्ष पर्वतीय राज्य की मांग उठी।
1952 में भाकपा के राष्ट्रीय सचिव कामरेड पीसी जोशी ने अलग राज्य की मांग को राष्ट्रीय फलक पर उठाया।
1989 में उत्तराखंड राज्य के लिए डीडी पंत की अध्यक्षता में यूकेडी का गठन।
1991 यूपी शासन में भाजपा के तीन मंत्रियों ने एवं विधायकों ने गैरसैंण में जनसभा कर जनता की मांग को समर्थन दिया। गैरसैंण में अपर शिक्षा निदेशालय एवं डायट का उद्घाटन किया।
1992 में उक्रांद ने उत्तराखंड राज्य का ब्लू प्रिंट जारी कर गैरसैंण को राजधानी घोषित किया।
1994 में यूपी शासन ने रमाशंकर कौशिक कमेटी गठित की। समिति ने गैरसैंण को राजधानी के लिए उचित माना।
1994 में पौड़ी में इंद्रमणी बडोनी के आमरण अनशन के बाद राज्य का आंदोलन तेज हुआ। इसके साथ ही गैरसैंण राजधानी को लेकर लेकर भी आंदोलनकारियों ने 157 दिन का क्रमिक अनशन किया।
1995 में यूपी के राज्यपाल मोती लाल बोरा ने राष्ट्रपति शासन के दौरान गैरसैंण में मिनी सचिवालय के लिए 7 लाख रुपये स्वीकृत किए।
1996 में गैरसैंण राजधानी की मांग को लेकर आमरण अनशन पर बैठे आंदोलकारियों को पुलिस ने जबरन उठाया।
2000 में उत्तराखंड महिला मोर्चा ने गैरसैंण राजधानी की मांग को लेकर खबरदार रैली निकाली।
2001 में राजधानी चयन के लिए उत्तराखंड की अंतरिम सरकार ने दीक्षित आयोग का गठन किया गया।
2002 में गैरसैंण की मांग को लेकर श्रीनगर में जनता का प्रदर्शन। गैरसैंण राजधानी आंदोलन समिति का गठन।
2007-2009 गैरसैंण मांग को लेकर प्रवासियों ने जनसंपर्क कर समर्थन जुटाना शुरू किया। प्रतिवर्ष दो अक्तूबर को ये संस्थाएं गैरसैंण में रैली आयोजित करती हैं।

गैरसैंण राजधानी के लिए बाबा मोहन उत्तराखंडी के अनशन -
9 फरवरी से 5 मार्च 2001 तक नंदाठौंक गैरसैंण में अनशन।
2 जुलाई से 4 अगस्त 2001 तक नंदाठौंक गैरसैंण में राजधानी के लिए अनशन।
13 दिसंबर 2002 से फरवरी 2003 तक चांदकोट गढ़ी पौड़ी में गैरसैंण राजधानी के लिए अनशन।
2 अगस्त से 23 अगस्त 2003 तक कौनपुर गढ़ी थराली में अनशन।
2 फरवरी से 21 फरवरी 2004 तक कोदियाबगड़ गैरसैंण में अनशन।
2 जुलाई से 8 अगस्त 2004 तक बेनीताल में अनशन।
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