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भुला दी गई बलिदान की दास्तां

Chamoli

Updated Wed, 08 Aug 2012 12:00 PM IST
कर्णप्रयाग। ‘राह को रोशन करने की उम्मीद में खुद जलते रहे, सोच कर उठाया कदम कि काफिला आगे भी बनता रहे’ ये पंक्तियां उत्तराखंड राज्य निर्माण और गैरसैंण राजधानी के लिए मरते दम तक संघर्षरत बाबा मोहन उत्तराखंडी के बलिदान को बयां करती है। शासन, प्रशासन एवं क्षेत्रीय नेताओं की उदासीनता ने बाबा के त्याग और उनकी अनशनस्थली बेनीताल को भी भुला दिया है।
राज्य निर्माण और गैरसैंण राजधानी की मांग के लिए 13 बार आमरण अनशन करने वाले बाबा मोहन उत्तराखंडी पहचान के मोहताज नहीं हैं। वर्ष 1948 में पौड़ी के एकेश्वर ब्लाक में ग्राम बठोली में मनवर सिंह नेगी के घर पैदा हुए मोहन सिंह नेगी बचपन से जुनूनी तेवरों के थे। वर्ष 1970 में बतौर क्लर्क बंगाल इंजीनियरिंग में भर्ती हुए लेकिन सरकारी नौकरी रास नहीं आई तो वर्ष 1994 में नौकरी छोड़कर वे राज्य आंदोलन में शामिल हो गए। दो अक्तूबर 1994 को मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहे में दिल्ली जा रहे आंदोलनकारियों पर पुलिस बर्बरता ने मोहन सिंह नेगी को बाबा मोहन उत्तराखंडी बना दिया। राज्य और गैरसैंण राजधानी के लिए बाबा का 11 जनवरी 1997 को लैंसीडौंन के देवीधार से शुरू आमरण अनशन का सफर आठ अगस्त 2004 को उनकी मौत के साथ ही रुका। आमरण अनशन के 37वें दिन कर्णप्रयाग प्रशासन ने उन्हें मां नंदा पखाण टोपरी उड्यार (बेनीताल) से जबरन उठाते हुए सीएचसी कर्णप्रयाग में भर्ती किया, जहां रात को उनकी मौत हो गई।
बाबा की मौत के कुछ सालों में ही शासन, प्रशासन एवं जनप्रतिनिधियों ने उनके संघर्ष, बलिदान और योगदान को भुला दिया। नई पीढ़ी जहां उनके योगदान से अंजान है। वहीं बाबा की पुण्य तिथि पर आज भी लोग दूधातोली में स्मृति स्मारक एवं बेनीताल में उन्हें याद कर रहे हैं। लेकिन अहम सवाल उठता है कि राज्य निर्माण के इस आंदोलनकारी को जिसने अपने प्राण ही न्योछावर कर दिए, क्या उसे इसी तरह का सम्मान और पहचान मिलनी चाहिए ?

इनका कहना है--
राज्य निर्माण एवं गैरसैंण राजधानी के लिए संघर्षरत रहे बाबा मोहन उत्तराखंडी सहित अन्य शहीदों और आंदोलनकारियों को प्रदेश की सरकारें भुला चुकी हैं। उत्तराखंड राज्य नौकरशाहों एवं नेताओं की ऐशगाह बन गया है, जबकि आंदोलनकारी दर-दर भटक रहे हैं।
- हरीश पुजारी, बहुगुणा विचार मंच संयोजक गढ़वाल-कुमाऊं
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