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देवता भी निभाते हैं भाई-बहन का रिश्ता

Chamoli

Updated Thu, 02 Aug 2012 12:00 PM IST
कर्णप्रयाग। रिश्तों की मर्यादाएं धरती पर ही नहीं निभाई जाती हैं। इन रिश्तों को देवी-देवताओं ने भी समय-समय पर निभाते हुए मानव जीवन के लिए प्रेरणा का कार्य किया। भले ही ये रिश्ते खून के न रहे हों लेकिन धर्म को साक्षी मानते हुए बनाए गए इन रिश्तों की परंपरा आज भी निभाई जाती हैं। इसकी मिसाल श्रीनंदा राजजात में भी देखने को मिलती है, जहां मां नंदा और लाटू देवता धर्म भाई-बहन के रिश्ते को अपनत्व एवं आस्था की भावनाओं के चरम तक पहुंचाते हैं। अपनी बहन को सुसराल भेजने के लिए लाटू देवता अपने मूल मंदिर वांण के बाद स्वयं कठिन स्थानों पर यात्रा की अगुवाई करते हुए उसे सकुशल अंतिम गंतव्य होमकुंड तक पहुंचाते हैं।
बारह वर्ष या उससे अधिक समय में आयोजित होने वाली श्रीनंदा राजजात में लाटू देवता की विशेष भूमिका मानी जाती है। लाटू देवता को मां श्रीनंदा का धर्म भाई माना जाता है। राजजात में देवी की छंतोली के साथ लाटू का निशान भी पूरी यात्रा में साथ होता है। लाटू देवता राजजात के सबसे कठिन स्थान ज्यूंरागली में देवी भक्तों को सकुशल रास्ता पार कराते हैं।

प्राचीन मान्यताएं--
किवदंतियों के अनुसार प्राचीन काल में कन्नोज का एक ब्राह्मण हिमालय भ्रमण और मां नंदा के दर्शनों के लिए पहुंचा लेकिन किन्हीं कारणों से वह वांण क्षेत्र में दांतों से अपनी जीभ को काट बैठा और उसकी मौत हो गई। इसी दौरान देवी मां उसकी आत्मा को अपने साथ कैलाश ले जाती है और उसे अपना धर्म भाई बनाने का आशीर्वाद देते हुए राजजात के दौरान वांण से यात्रा की अगुवाई की जिम्मेदारी भी सौंपती है।

ज्यूंरागली में देनी पड़ती है लाटू को भेंट
समुद्रतल से लगभग 17,500 मीटर ऊंचाई पर स्थित चट्टानी मार्ग और राजजात का सबसे कठिन मार्ग ज्यूंरागली है। इसे पार कराने पर देवी भक्तों को लाटू के पश्वा (डंगरिया) को लाटू देवता की भेंट देनी पड़ती है।

इनका कहना है--
मां श्रीनंदा और लाटू देवता धर्म भाई-बहिन है। लाटू देवता राजजात में अपने भाई धर्म को पूरी श्रद्धा के साथ निभाता है। श्रीनंदा की छंतोली जब वांण में पहुंचती है, तो लाटू सबसे अधिक प्रसन्न होते हैं। वहीं बहिन को कैलाश विदा करने के लिए वह वांण से पथ प्रदर्शक बनकर चलते हैं।
-देवीदत्त कुनियाल, पुजारी लाटू देवता मंदिर वांण (देवाल)
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