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भोजपत्र की छंतोलियां भी बिखेरेंगी छटा

Chamoli

Updated Wed, 01 Aug 2012 12:00 PM IST
कर्णप्रयाग। देवभूमि उत्तराखंड ही नहीं वरन भारतवर्ष में धार्मिक आयोजनों में भोजपत्र का विशेष महत्व है। प्राचीन समय में घरों में धार्मिक ग्रंथों से लेकर कर्मकांड की पुस्तकों का लेखन भी भोजपत्र पर ही होने के प्रमाण हैं। मां श्रीनंदा राजजात में भी इस देव वृक्ष भोजपत्र का सबसे विशेष महत्व है। दरअसल राजजात की मनौती और शुभ मुहूर्त भी भोजपत्र पर लिखा जाता है।
उच्च हिमालयी क्षेत्र में समुद्र तल से 10 हजार मीटर से लेकर 14,500 मीटर की ऊंचाई पर पाए जाने वाले भोजपत्र को देव वृक्ष माना गया है। उत्तराखंड में भोजपत्र की महत्ता और भी बढ़ जाती है। एक तरफ यह श्रीबदरीनाथ धाम से लेकर राजजात में विशेष स्थान लिए हुए है वहीं ऊंचाई वाले क्षेत्र में रहने वाले लोगों (भोटिया समुदाय) के जनजीवन से भी जुड़ा हुआ है। यहां रहने वाले लोग इसे अपने घरेलू उपयोग से लेकर सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी करते हैं।

राजजात में भोजपत्र की भूमिका
श्रींनदा राजजात में मायके पक्ष के अंतिम पड़ाव भगोती के ससुराल क्षेत्र में यात्रा के पहुंचते ही यहां से भोजपत्र की देवी की छंतोलियां शामिल होने लगती हैं। वहीं कुरुड़ और बधाण से भी राजजात में भोजपत्र से बनी देवी की छंतोली शामिल होती हैं। भोजपत्र यज्ञ, हवन में भी प्रयोग में लाया जाता है।

औषधीय गुणों से भरपूर भोजपत्र--
भोजपत्र एल्पाइन ट्री है। यह समुद्रतल से 10 हजार से 14500 मीटर की ऊंचाई पर पाया जाता है। वनस्पति विज्ञान में इसे बैटुला यूपीलिम कहा जाता है। यह औषधीय रूप में भी लाभकारी है।

इनका कहना है--
भोजपत्र देव वृक्ष के रुप में पूजा जाता है। पूर्व काल में इसे कागज के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। तब जन्मपत्री से लेकर शादी के लग्न भी भोजपत्र पर ही बनते थे। राजजात में भी इसकी भूमिका महत्वपूर्ण है, मनौती के दिन और राजजात के दिन का उल्लेख भोजपत्र पर ही किया जाता है।
-पंडित अनुसूया प्रसाद कोठियाल (दो राजजात का नेतृत्व कर चुके हैं)

भोजपत्र हिमालय के सबसे अधिक ऊंचाई वाले स्थानों पर उगता है। इसमें औषधीय गुण भी भरपूर होता है। भोटिया समुदाय के लोग इसे अपने आम जनजीवन में भी उपयोग में लाते हैं। भोजपत्र जनपद चमोली में नीति-माणा तथा पिथौरागढ़ में दारमा, व्यास एवं जुहार घाटी में सबसे अधिक होता है।
-डा. वीपी भट्ट, वैज्ञानिक जड़ी-बूटी शोघ एवं विकास संस्थान, गोपेश्वर चमोली
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