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सुविधाओं का ढांचा होता तो इतनी तकलीफ नहीं होती

Bageshwar

Updated Sat, 22 Sep 2012 12:00 PM IST
बागेश्वर। कपकोट क्षेत्र के लोगों को प्राकृतिक आपदाओं के साथ ही मानवीय भूल और हर स्तर पर हुई उपेक्षा का खामियाजा भोगना पड़ रहा है। अलग राज्य बने 11 साल बीत जाने के बावजूद यहां दूरस्थ क्षेत्रों में यातायात और स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं हैं। सामान्य दिनों में भी रोगियों को डोली में रखकर दिन भर के सफर के बाद कपकोट या बागेश्वर लाना पड़ता है। आपदा के इस दौर में यही लापरवाही मुसीबत का कारण बनी है।
कपकोट का उच्च हिमालयी क्षेत्र दुर्गम और आपदाओें की दृष्टि से अत्यधिक संवेदनशील है। क्षेत्र के विकास के लिए सड़क संपर्क की तीव्र आवश्यकता है। जिला, तहसील और ब्लाक मुख्यालय तक सीधी पहुंच के लिए यातायात सुविधाएं आज भी अच्छी हालत में नहीं हैं। हिमालय से लगे झूनी और खलझूनी गांवों के पास तक बनी सड़क पहले से ही बंद पड़ी है। सामान्य दिनों में भी यहां के लोग 18किमी पैदल चलकर सड़क तक आ रहे थे। इस वक्त इलाके की भराड़ी-शामा और कपकोट-कर्मी जैसी प्रमुख सड़कें बंद हैं। इस वक्त लोगाें को 50 किमी तक पैदल चलना पड़ रहा है। झूनी, खलझूनी से लेकर कुंवारी, बाछम, बदियाकोट,निखिला खलपट्टा, सोराग सहित कई गांव सड़क संपर्क के अभाव में अलग थलग पड़े हैं। दर्जनों वाहन जगह-जगह फंसे हुए हैं। परिवहन समस्या ने तमाम अन्य कठिनाइयां पैदा कर दी हैं। सबसे बड़ी समस्या राशन और दवाओं की है। दुकानों में धीरे धीरे राशन खत्म होने लगा है।
दुर्गम और टूटे हुए पैदल रास्तों से घोड़ों में लाया गया खुले बाजार का राशन आम आदमी की पहुंच से बाहर होगा और भुखमरी की नौबत आ जाएगी। राशन की तरह ही स्वास्थ्य सेवाएं भी चिंताजनक हालत में हैं। लोगों का कहना है कि उत्तराखंड बनने बाद हालत बदतर हुए हैं। अस्पतालों के भवन बने हैं किंतु डाक्टरों और कर्मचारियों के पद खाली हो गए हैं। दुर्गम इलाकों में कोई भी कर्मचारी रहना नहीं चाहता। रोगियों को डोली में रखकर पैदल रास्तों से कपकोट या बागेेश्वर लाना पड़ता है। जिसमें पूरा दिन लग जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि पूर्व में विकास के नाम पर बनी सड़कें आधी अधूरी हैं। विकास का शेष ढांचा और भी दयनीय हालत में है। उनका कहना है कि आपदा आने के बाद घड़ियाली आंसू बहाने के बजाए समय पर विकास का ढांचा खड़ा किया होता तो आज पीड़ितों को इतनी कठिनाई नहीं उठानी पड़ती।
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