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साधु यू ही नहीं बने सपा के दादा

Varanasi

Updated Sun, 02 Dec 2012 05:30 AM IST
वाराणसी। साधु! रामकरण यादव को चौधरी चरण सिंह ने यही नाम दिया था। उनकी सादगी (साधुपना) जनता को भी भाती थी। लोग उनमें गांधी का अक्स देखते थे। चाहने वालों के बीच वह पूर्वांचल के गांधी भी थे जबकि गांधी और गांधीवाद से उनका रिश्ता था तो सिर्फ इतना कि वह सहकारिता आंदोलन से निकले नेता भर थे। यह जुमला इसलिए भी बेमानी है क्योंकि पश्चिम के यादव समाज में भी दादा की पकड़ उतनी ही गहरी थी, जितनी पूरब के जिलों में। सन 1985 तक चौधरी साहब का जमाना बीतने को था और साधु से उनका नाम बदल कर दादा हो गया। वह समाजवादी पार्टी की राजनीति के चौधरी हो गए। सीधे चुनाव के मैदान में उतरना छोड़ दिया और सबको जिताने में लग गए। दादा को अजातशत्रु माना जाता था क्योंकि वह जिसके समर्थन में खड़े रहते थे, उसके हाथ जीत लगती थी।
दादा के निधन की खबर सुनकर डा. बहादुर सिंह यादव ने कहा कि राजनीति का कैंसर दादा को खा गया। यह सही है कि दादा को कैंसर था। उनके नाम से एक ब्लाग बना है। उसमें 22 जुलाई 2009 के बाद कोई पोस्ट नहीं की गई है। उसमें ‘फिर खुदा ही मालिक है’ शीर्षक से एक पोस्ट है, जिसमें राजनीति के वर्तमान हालात का जिक्र है। आदमी के नहीं रहने पर उससे जुड़े हर जर्रे के मायने निकाले जाते हैं। नहीं मालूम कि इन बातों से कोई मतलब निकलता भी या नहीं है। इतना तो तय है कि दादा ने 85 साल चार दिन के जीवन में जो किया, उसकी मिसाल और व्याख्या तरह-तरह से होगी।
ईशोपुर गांव में 27 नवंबर 1927 को जन्मे दादा के सार्वजनिक जीवन की शुरुआत ग्राम पंचायत से हुई। ग्राम प्रधान, खानपुर सहकारी समिति के सभापति के रूप में वह लोगों का विश्वास जीतते गए और कद बढ़ता गया। स्कूल में तो वह आठवीं जमात से आगे नहीं बढ़ पाए थे लेकिन सार्वजनिक जीवन में वह स्नातक, स्नातकोत्तर, पीएचडी तक करते चले गए। वर्ष 1969 के मध्यावधि चुनाव में वह बीकेडी से ही सैदपुर, जो आधा गाजीपुर और आधा बनारस में पड़ता था, के विधायक चुने गए। उनके नेतृत्व में 1974 में भारतीय क्रांतिदल ने गाजीपुर जिले की सभी सीटें जीतीं तो वह अजातशत्रु कहलाने लगे लेकिन वह खुद चुनाव नहीं जीत पाए। सन 1967 में जब मुलायम सिंह यादव चुनाव हार गए थे। तब दादा चौधरी चरण सिंह के करीबी थे। चौधरी साहब से कह कर उन्होंने उनको विधान परिषद का सदस्य बनवाया। नेता विरोधी दल के रूप में जगह दिलाई। वर्ष 1985 में जब दलित मजदूर किसान पार्टी टूटी और मुलायम सिंह यादव ने अलग राह चुनी तो दादा को अपने साथ खड़े पाया। वह उनके सेनापति बने। मुलायम सिंह के साथ पूर्वांचल भर में सघन दौरा किया और समाजवादी पार्टी का संगठन खड़ा किया। वह साधु से दादा बन चुके थे। समाजवादी पार्टी की बैठकों में कार्यकर्ता और खुद नेताजी (मुलायम सिंह) भी उनको दादा कहने लगे। समाजवादी पार्टी आज पूर्वांचल में मजबूत है तो वह दादा की वजह से ही। दादा ने विधानसभा चुनाव से किनारा कर लिया लेकिन पार्टी ऐसे नेता के अनुभव से वंचित कैसे रहती। पार्टी ने वर्ष 1990 और 1997 में उन्हें विधानसभा परिषद का सदस्य बनाया। ईशोपुर गांव में उनके नाम से इंटर कालेज और डिग्री कालेज दोनों स्थापित हैं।
पिछले दिनों दादा के भर्ती होने की खबर सुनकर सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव 6 अक्तूूबर को उनकी सेहत का हाल जानने बनारस पहुंचे थे। उसके बाद दादा कई बार घर और अस्पताल का चक्कर लगाते रहे लेकिन उनकी सेहत नहीं सुधरी। इस बीच शिवपाल सिंह यादव उनको देखने आए और फिर बलराम यादव। गाजीपुर के वरिष्ठ नेता दयानंद यादव के मुताबिक दादा की सादगी, प्रतिबद्धता और ईमानदारी के नेता और कार्यकर्ता दोनों ही कायल थे।
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