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स्मारक में तब्दील होगा धूमिल का पैतृक आवास

Varanasi

Updated Sat, 10 Nov 2012 12:00 PM IST
वाराणसी। महज 39 वर्ष के अल्प जीवनकाल में निर्भीक कविताओं के बूते हिंदी साहित्य पर अमिट छाप छोड़ने वाले सुदामा पांडेय धूूमिल की यादों को संरक्षित करने की छटपटाहट आखिर रंग ले आई। उनकी मृत्यु के 37 वर्ष बाद अब उनके गांव में उनका स्मारक बनेगा। यहां धूमिल स्तंभ होगा और उनकी प्रतिमा स्थापित की जाएगी।
जिले के खेवली गांव में खंडहर में तब्दील हो चुके सुदामा पांडेय धूमिल के पैतृक आवास को धूमिल स्मारक के रूप में तब्दील करने का निश्चय किया गया है। कभी इस आवास का प्रवेश द्वार लगाने के लिए लखौरी ईंटों से बनाई गई दीवार का शेष हिस्सा जो अब एक खंभे की भांति दिखता है, को धूमिल स्तंभ का नाम देकर संरक्षित किया जाएगा। सुदामा पांडेय धूमिल के ज्येष्ठ पुत्र रत्नशंकर पांडेय द्वारा परिजनों और प्रियजनों से विमर्श के बाद काफी प्रयत्न से स्मारक और स्तंभ की योजना संभव हो सकी है। रत्नशंकर पांडेय ने शतायु हो चुकीं अपनी दादी प्रभावती देवी, धूमिल से सिर्फ नौ महीने बड़े उनके चचेरे भाई रमाशंकर पांडेय और छोटे चचेरे भाई पारस नाथ पांडेय के साथ ही अपने अनुज आनंद शंकर पांडेय, शुभचिंतक देवी शंकर सिंह से गहन विमर्श किया। इसके बाद तय किया कि स्मारक के प्रथम चरण का कार्य धूमिल की 37वीं पुण्यतिथि 10 फरवरी से पूर्व पूरा कर लिया जाए। इसके तहत युवा साहित्यकारों एवं खेवली के युवाओं द्वारा क्रमिक श्रमदान से आवास परिसर की सफाई की जाएगी। पांडेय परिवार के इस प्रयत्न की जानकारी अन्नपूर्णा मंदिर के महंत रामेश्वर पुरी जी महाराज को हुई तो उन्होंने अपनी ओर से धूमिल की मूर्ति स्थापित कराने का प्रस्ताव देते हुए कहा कि राष्ट्रधर्म के प्रति समर्पित रचनाकार के लिए कुछ करके वह व्यक्तिगत रूप से गौरवान्वित महसूस करेंगे।

धूमिल एक नजर में
वाराणसी। संसद से सड़क तक, सुदामा पांडेय का प्रजातंत्र, कल सुनना मुझे और धूमिल की कविताएं काव्य संग्रहों के बल पर विश्व भर के हिंदी पाठकों के लिए शोध का विषय सुदामा पांडेय धूमिल की रचनाएं वर्तमान में देश के 105 विश्वविद्यालयों के हिंदी पाठ्यक्रम का हिस्सा हैं। अमेरिका की नार्दर्न ईस्टर्न यूनिवर्सिटी में वर्ष 1984 से ही उनकी कविताएं हिंदी के पाठ्यक्रम में पढ़ाई जा रही हैं। इटली की प्रो. मैरियोला आफरीदी ने 1985 में संसद से सड़क तक का इटैलियन में अनुवाद किया। आखिर ऐसे यशस्वी रचनाकार की उपेक्षा देश की सरकारें कब तक करती रहेंगी।
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