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लोकमानस में अब भी बसी हैं परंपराएं

Varanasi

Updated Fri, 26 Oct 2012 12:00 PM IST
रामनगर। देखो-देखो, राजा साहब आ रहे हैं। अब सीढ़ी से नीचे उतर रहे हैं, हाथ जोड़ लो। विजयादशमी के दिन रामनगर के लंका मैदान में कंधे पर बैठे बेटे बंटी से बदलू ने यही कहा। वह कटरिया गांव से बेटे को राजा की शाही यात्रा दिखाने आया था। राजतंत्र में दशहरा के दिन राजा का दर्शन शुभ माना जाता था। वैसे भी काशी नरेश कोई साधारण नरेश नहीं थे। वे शिव के प्रतिनिधि के रूप में देखे जाते थे। समय बदला, देश आजाद हुआ और राजतंत्र समाप्त हो गया पर लोकमानस में ये परंपराओं आज भी बसी हुई हैं।
अनंतनारायण की शाही यात्रा रामनगर किले से पांच हाथियों के काफिले के साथ निकली। उनके अभिवादन में कुछ ने हाथ जोड़े तो कुछ ने दोनों हाथ उठाए पर हर-हर महादेव के पारंपरिक जयघोष में पहले जैसा उत्साह नहीं दिखा। न तो शाही यात्रा के आगे चलने वाला घुड़सवार दिखा और न ही उसके डंके की आवाज सुनाई दी। शाही यात्रा लंका मैदान पहुंची पर राम-रावण युद्ध के समय अनंतनारायण वहां मौजूद नहीं थे। मान्यता है कि दो राजाओं के बीच युद्ध के समय तीसरा राजा दर्शक नहीं रह सकता। मैदान की परिक्रमा करने के बाद अंनतनारायण हाथी से नीचे उतरे और पूजा कक्ष में चले गए। पूजन के बाद नंगे पांव वापस आए और गाड़ी में बैठ किले की ओर रवाना हो गए।
लंका मैदान में वैश्वीकरण के इस दौर में सौभाग्य सूचक परंपराओं का बाजार भी सजा था। दुकानों पर कहीं नीलकंठ पक्षी बिक रहे थे तो कहीं शमी की टहनियां। नेमी व आमजन नीलकंठ खरीद उसे उड़ा रहे थे। सरायगोवर्धन के नेमी भगीरथ ने दशहरे के दिन ऐसा करना शुभ बताया। बाजार है तो जाहिर है कि दलाल भी होंगे। कुछ लोग दुकानदार से 40-40 रुपये में नीलकंठ खरीदना चाह रहे थे। इसी बीच कुछ दलाल पहुंचे और कहने लगे कि 40 रुपये में आज के दिन कहीं नीलकंठ बिकेगा। गरमा-गरमी हुई तो बनती बात बिगड़ गई। साथ ही पैसे के बल पर सौभाग्य प्राप्त करने की योजना भी टूट गई। पढ़े-लिखे लोग नीलकंठ को उड़ाकर पर्यावरण की दुहाई दे रहे थे। श्रीराम कालेज आफ कामर्स, दिल्ली के प्राध्यापक डा. एस प्रकाश ने पिंजड़े से नीलकंठ को उड़ाया और पर्यावरण सुरक्षा की बात कही। अधिकांश के हाथों में शमी भी दिखी। इधर, जब काशी नरेश परिवार आपसी विवादों के चलते सुर्खियों में रहा हो तब परंपराओं को बचाने की अनंतनारायण और आमजन की यह कवायद काफी मायने रखती है।
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