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सभी को वैज्ञानिक बनाने की सोच विकास के अनुकूल नहीं

Varanasi

Updated Fri, 19 Oct 2012 12:00 PM IST
वाराणसी। इसरो के प्रख्यात वैज्ञानिक तथा चिंतक डा. वाईएस राजन ने कहा है कि भारतीयों को शिक्षा के प्रति सोच बदलनी होगी। हमारे देश में सभी को वैज्ञानिक बनाने की होड़ लगी हुई है। यह सोच विकास के अनुकूल नहीं है। विज्ञान का ज्ञान आवश्यक है लेकिन वैज्ञानिक बनाना आवश्यक नहीं है। वे महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में शिक्षा शास्त्र विभाग की ओर से एजुकेशन टू इंडियंस : प्रजेंट एक्शन एंड फ्यूचर डाइरेक्शन्स 2030 विषयक गोष्ठी में बोल रहे थे।
गांधी अध्ययनपीठ में आयोजित गोष्ठी में उन्होंने कहा कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के दौर में आर्थिक विकास के लिए नवीन कौशलों पर आधारित शिक्षा की भारतीयों को आवश्यकता है। नवीन कौशलों का विकास विद्यालयों, महाविद्यालयों तथा विश्वविद्यालयों से होगा। उन्होंने वर्तमान भारतीय शिक्षा व्यवस्था को रूल, रेगुलेशन तथा रोल तक सीमित बताया। कहा कि मनुष्य का निर्माण और नैतिकता का विकास विद्यालयी शिक्षा से संभव नहीं है। यह एक आंतरिक प्रक्रिया है। इसका स्वत: विकास हो सकता है। कहा कि भारत में मेडिकल, इंजीनियरिंग, एमबीए जैसे हाई प्रोफेशनल शिक्षा लेने वाले महज 1.8 प्रतिशत हैं। सिंपल ग्रेजुएट आठ प्रतिशत हैं, वहीं इंटरमीडिएट और हाईस्कूल तक शिक्षा ग्रहण करने वाले 20 प्रतिशत लोग हैं। लगभग 70 फीसदी बच्चे कक्षा पांच और आठ पास करने के बाद ड्रापआउट होते हैं। जरूरत है इस 70 प्रतिशत को नवीन कौशलों (माडर्न स्किल) में तब्दील करने की। आर्थिक विकास के लिए नवीन कौशलों पर आधारित शिक्षा ही आज के दौर की आवश्यकता है।
शिक्षकों और छात्रों से सीधा संवाद स्थापित करते हुए डा. राजन ने कहा कि शिक्षण क्षेत्र में प्रयोग होने वाली आधुनिक तकनीकी को अपनाने की जरूरत है। इस दौरान शिक्षकों और छात्रों की ओर से पूछे गए सवालों का जवाब देकर उनकी जिज्ञासाओं को भी उन्होंने शांत किया। अध्यक्षता पत्रकारिता संस्थान के आचार्य प्रो. राममोहन पाठक ने की। स्वागत विभागाध्यक्ष प्रो. अरविंद कुमार पांडेय ने किया। मुख्य वक्ता का परिचय व धन्यवाद ज्ञापन प्रो. कल्पलता पांडेय ने किया। संचालन डा. नीति भोला ने किया। इस मौके पर प्रो. गोपाल नायक, डा. शशिकांति त्रिपाठी, डा. सुरेंद्र राम, डा. राजेंद्र यादव मौजूद रहे।
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