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कमर पर गमछा, कंधे पर लंगोट है अस्सी का यूनिफार्म

Varanasi

Updated Thu, 27 Sep 2012 12:00 PM IST
वाराणसी। अस्सी मोहल्ला नहीं अष्टाध्यायी है और बनारस उसका भाष्य, मगर क्यों। तमाम देशी-विदेशी इसे दुनिया का टीका बनाने की नाकाम कोशिश में वर्षों से क्यों लगे हैं। कमर पर गमछा, कंधे पर लंगोट अस्सी का यूनिफार्म है जो सफारी और जींस पैंट के प्रदूषण से क्यों प्रभावित हो रहा है। क्यों गालियां काशी का अलंकरण बनीं। क्यों गुरु शब्द बनारस का सरनेम है। ऐसे बहुत से रोचक प्रश्नों के उत्तर बुधवार की शाम बिड़ला छात्रावास में रहने वाले छात्रों को यशस्वी कथाकार डा. काशीनाथ सिंह से मिले।
यूं तो छात्रावास में कथाकार से मुलाकात और काशी का अस्सी के वाचन के लिए सत्र शाम पांच बजे होना था लेकिन चार बजे ही छात्र प्रेमचंद सभागार की कुर्सियों पर जम चुके थे। शाम 5:22 बजे जैसे ही काशीनाथ सिंह ने छात्रावास में प्रवेश किया, आ गए...आ गए...का शोर प्रवेश द्वार से सभागार तक मुखर हो गया। कुछ क्षण बीते, डा. सिंह सभागार में थे। सभी ने खडे़ होकर अभिवादन किया तो पान घुलाए और हाथों में पान की थैली लिए डा. सिंह ने हर चेहरे को मुस्कराते हुए देखा। जिन्हें पहचानते थे उन्हें देख कर भौंहें भी सिकोड़ीं-फैलाईं। सफेद बाल-खसखसी दाढ़ी युक्त गोरा मुखमंडल, साधारण सा धारीदार कुर्ता और पाजामा पहने डा. सिंह को देखते ही छात्रों के मोबाइल कैमरे निकल गए। स्वागत की औपचारिकता के बाद वह पहले वे कुछ छात्राओं से रूबरू हुए। काशी की गाली को अलंकरण कह, पहले उन्हें गाली महात्म्य समझाया। फिर काशी का अस्सी में के कुछ अंश का वाचन किया। बनारसी पंचाक्षरियों का जितना मजा पुरुष श्रोताओं ने लिए उतना ही लुत्फ छात्राओं और अध्यापिकाओं ने भी। हर कुछ मिनट के बाद सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठता। उन्होंने 1950 में बीएचयू के जर्मन विभाग के प्रो. करमाकर के प्रयासों से शिक्षक गोष्ठी कराने और 1972 में छात्रसंघ द्वारा ब्रोचा छात्रावास के मैदान पर हुए कवि सम्मेलन में नीरज, सोम ठाकुर जैसे नामी कवियों की, शरद जोशी द्वारा गद्य व्यंग्य पढ़कर बोलती बंद कर देने के संस्मरण भी सुनाए।

सब सुनते रहे टकटकी लगाए
वाराणसी। बिड़ला सी छात्रावास में साप्ताहिक कार्यक्रम मुलाकात के दौरान छात्र ही नहीं शिक्षक-शिक्षकाएं भी टकटकी लगाए डा. काशीनाथ सिंह को सुन रहे थे। सुनने के बाद उनकी कृतियों अपना मोर्चा, महुआ चरित, रेहन पर रग्घू पर भी शिक्षकों और छात्रों ने उनसे संवाद किया। इस दौरान प्रो. बलराज पांडेय, प्रो. चंद्रकला त्रिपाठी, डा. अवशेध प्रधान, डा. नीरज खरे, डा. एचएन. प्रसाद, प्रो. वशिष्ठ अनूप, डा. सर्वेश विक्रम सिंह, प्रो. राधेश्याम दुबे प्रमुख रूप से उपस्थित थे। स्वागत सत्येंद्र शुक्ल, संचालन धीरेंद्र एवं धन्यवाद ज्ञापन पवन शुक्ल ने किया।
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