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बाजारू साहित्य की बिकाऊ होड़ ज्यादा खतरनाक

Varanasi

Updated Sun, 09 Sep 2012 12:00 PM IST
वाराणसी। साहित्य और संस्कृति की चुनौतियों को चिह्नित करने के साथ ही उनसे निबटने और सतर्क रहने जैसे संदर्भ शनिवार को विद्वानों के विचार मंथन का हिस्सा बने। किसी ने एक तरह की कविता लिखने के प्रदूषण से साहित्य को उबारने की अपील की तो किसी ने बाजारू घटिया साहित्य की बिकाऊ प्रवृत्ति को बढ़ावा देने पर चोट किया। इस बहस में कबीर, गालिब, शमशेर के बाजार से लेकर मौजूदा दौर में परिवार को छिन्नभिन्न करने वाले बाजार की भयावहता पर रोशनी डाली गई। इसी के साथ राजघाट स्थित वसंत महिला कालेज के एसेंबली हाल में समकालीन चुनौतियां : भाषा, संस्कृति, शिक्षा और साहित्य विषयक दो दिनी परिचर्चा शनिवार को पूरी हो गई।
बतौर मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार विष्णु चंद्र शर्मा ने कहा कि अपनी सभ्यता को बिगाड़ने के लिए हम खुद जिम्मेदार हैं। कारपोरेट संस्कृति ने सभ्यता पर सबसे ज्यादा कुठाराघात किया है। इस दौर में सत्ता का हस्तक्षेप ही भाषा, संस्कृति एवं साहित्य के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती है। जब तक हम मानवीय गुलामी को नहीं तोड़ेंगे तब तक समाज का भला नहीं हो सकता। पिछड़ेपन की वजह यह है कि हमने आजादी के बाद भाषाओं से जुड़ने का प्रयास नहीं किया, बल्कि दूरी बना ली। भारतीय भाषा कार्यक्रम के निदेशक अभय कुमार दुबे ने हिंदी के सांस्कृतिक क्षेत्र को बेहद उर्वर बताया। कहा कि यही ताकत अंग्रेजी के बढ़ते वर्चस्व से लोहा ले सकती है। अंग्रेजों से हमने बहुत सीखा लेकिन अपनी भाषा के लिए संघर्ष करना नहीं सीख पाए। प्रो. बलिराज पांडेय ने साहित्य का धर्म उजागर किया। बताया कि साहित्य का धर्म वह है जो हमारे भीतर छिपी मनुष्यता को उजागर करे। आज का समाज हृदय की उन्मुक्तता पर नहीं बल्कि देह की उन्मुक्तता पर बल देता है। डा. आरती निर्मल ने पाश्चात्य आलोचना के संदर्भ में साहित्य और संस्कृति पर फोकस किया। प्रोफेसर चंद्रकला त्रिपाठी, विधान चंद्र राय, डा. वशिष्ठ अनूप, डा. राजेंद्र प्रसाद पांडेय, शैलेंद्र सागर ने विचार व्यक्त किए। इससे पहले अतिथियों का स्वागत प्राचार्या विजया शिवपुरी ने किया। रिपोर्ट डा. मीनू अवस्थी ने प्रस्तुत की। संचालन डा. शशिकला त्रिपाठी और धन्यवाद ज्ञापन डा. वंदना झा ने किया।
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