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पाप मुक्ति के लिए विदेशियों ने की पंचक्रोशी यात्रा

Varanasi

Updated Sat, 01 Sep 2012 12:00 PM IST
वाराणसी। विदेशियों ने भारतीय धर्म-संस्कृति के विभिन्न पहलुओं को अपनाया है। किसी ने सनातन धर्म स्वीकार किया, किसी ने संन्यास लिया तो किसी ने सनातनी विधि से विवाह रचाया। कोई सपरिवार हिंदू ही हो गया लेकिन शुक्रवार को जो हुआ वह पहले कभी नहीं हुआ था। 12 विदेशियों के दल ने पुरुषोत्तम मास में पंचक्रोशी यात्रा की। वह भी इस मान्यता में आस्था रखते हुए कि पुरुषोत्तम मास में पंचक्रोशी यात्रा करने वालों के सभी जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं।
दल के अधिकतर सदस्य लंबे समय से भारतीय धर्म संस्कृति से जुड़े हैं। साथ ही हिंदी का भी अच्छा ज्ञान रखते हैं। भारतीय रंग में रंग चुके इटली, फ्रांस, इजराइल, जापान और मैक्सिको के मूल निवासियों का पंचक्रोशी यात्रा के पीछे दोहरा उद्देश्य था। एक तो यह कि इस परिक्रमा से उनके पाप कट जाएं और दूसरा यह कि वे भारतीयों की आस्था को स्वयं अनुभूत कर सकेंगे। ज्ञानवापी, कंदवा, भीमचंडी, रामेश्वरम् और कपिलधारा पड़ावों की यात्रा इन्होंने भले ही चार पहिया वाहन से की लेकिन उनके सामने सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा हुआ कि इस यात्रा में पैदल चलने वाली महिलाओं की संख्या सबसे अधिक क्यों है? जवाब जानने के लिए दल के सदस्यों ने ग्रामीण महिलाओं के साक्षात्कार भी रिकार्ड किए। पैजामा पहन कर कुर्ता सिर पर रख लेने वाले इजराइल के सेरोन का अंदाज सबसे जुदा था। चाहे गंगा का तट हो या फिर पांचों पड़ावों पर पड़ने वाले शिवालय सभी जगह विशिष्ट तरीके से उनका प्रणाम करना दूसरों के लिए आकर्षण का केंद्र रहा। इटली की नताली और 11 वर्षीय बेटे चैतन्य ने भी यह यात्रा की। नताली के पति दानियेलो ने जूना अखाड़ा से दीक्षा ली थी। दो वर्ष पूर्व उनका निधन हो गया। इससे पूर्व मैक्सिको निवासी केदार मैक्सिकन और उनकी धर्मपत्नी इटली की रुबैरता उर्फ रुबि के नेतृत्व में विदेशी तीर्थयात्रियों ने ज्ञानवापी परिसर में व्यासपीठ पर विधानपूर्वक संकल्प लेकर यात्रा का श्रीगणेश सुबह आठ बजे किया। पांचों पड़ावों पर दर्शन पूजन और अध्ययन करते हुए शाम पांच बजे सभी वापस मणिकर्णिका घाट पहुंचे। वहां बारी-बारी से आचमन करने के बाद पुन: ज्ञानवापी पहुंच कर संकल्प छोड़ा।
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