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छोड़कर चला न जाए काशी को शिवत्व

Varanasi

Updated Tue, 28 Aug 2012 12:00 PM IST
वाराणसी। शहर में हजारों मीट्रिक टन कचरा सड़ रहा है। उसकी सड़ांध से जीना मुहाल हो गया है। लोग बीमारी के साए में नरक तुल्य जीवन जीने को विवश हैं। ऐसे ही एक बार काशी को दुर्भिक्ष और महामारी से बचाने के लिए दिवोदास धन्वंतरि ने राज्य करना स्वीकार किया था। तब उन्होंने देवी-देवताओं को यहां से बाहर कर दिया था। भगवान शिव को भी अपनी प्रिय नगरी का त्याग करना पड़ा। एक बार फिर वैसे ही हालत नजर आ रहे हैं लेकिन कोई दिवोदास नहीं दिख रहा। सवाल उठता है कि क्या काशी से उसका शिवत्व एक बार फिर छिन जाएगा?
पौराणिक आख्यानों के मुताबिक काशी में भीषण दुर्भिक्ष पड़ा और महामारी फैल गई। जनहानि होने लगी। इस संकट से उबारने के लिए ब्रह्मा के निवेदन पर दिवोदास धन्वंतरि से काशी का राजकाज संभाला था। उनकी जयंती धनतेरस पर घर की सफाई की जाती है। प्राचीन काल में लोग मिट्टी का बरतन इस्तेमाल करते थे। आज भी बर्तनों को बदलने की परंपरा का निर्वहन किया जाता है। काशी का राज्य संभालने के बाद दिवोदास ने धनंजय को माता अन्नपूर्णा को लाने के लिए भेजा। कामरूप में तप करके धनंजय ने देवी को काशीवास के लिए राजी किया। दिवोदास ने नगर को स्वच्छ और सुंदर बनाया। द्रव्य और भेषज गुण के ज्ञान के आधार पर महामारी से मुक्ति दिलाई। त्रिशूल पर बसी काशी को त्रिताप से मुक्ति दिलाकर आनंद-कानन बना दिया। भगवान शिव काशी का विछोह सहन नहीं कर पा रहे थे। उन्होंने 64 योगिनियों, गणों और विनायक को यहां भेजा। किसी तरह दिवोदास राजी हुए और शिव काशी लौटे। इस पौराणिक आख्यान की स्थितियां फिर उत्पन्न हो गई हैं। अबकी महामारी की नौबत प्राकृतिक आपदा और दुर्भिक्ष के चलते नहीं, बल्कि आधुनिक देवताओं (अफसरों, नेताओं) की गलत नीतियों के चलते आई है। शहर में रोज 650 मीट्रिक टन कचरा निकलता है। ए-टू-जेड 400 टन से भी कम की उठान कर रहा था और हजारों टन का बैकलाग था। उसने 23 अगस्त से काम बंद कर दिया। महापौर रामगोपाल मोहले ने मध्य जुलाई में शपथ ग्रहण के बाद कूड़ाघरों को हटाने का वादा किया था। उनका हटना तो दूर पूरा शहर की कूड़ा घर बन गया है। नए ‘ब्रह्मा’ के सामने मुश्किल है कि वह किस दिवोदास को जिम्मा सौंपे और किन देवताओं को बाहर करें।
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