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शहनाई के घरानों में उठने लगी बांसुरी की पुकार

Varanasi

Updated Sun, 19 Aug 2012 12:00 PM IST
वाराणसी। पूर्वांचल और बिहार की गड़हियों में उगने वाले नरकट के पुत्तुर से स्वरों का संसार सजाने की चाहत कम हो रही है। जिस शहनाई ने शमसुद्दीन को भारतरत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां बना दिया, उसमें फूंकने की ताब युवा पीढ़ी में नहीं दिख रही है। काशी के शहनाई कलाकारों के लाडले अब कन्हैया की तरह बंशी बजैया बनकर घूम रहे हैं। यही हाल रहा तो जिस काशी के घाटों से उठने वाली शहनाई की गूंज ने पूरी दुनिया को झकझोर दिया था, वहीं उसके स्वर शायद ही सुनाई दें। ऐसा सरकार की अनदेखी के चलते हो रहा है। जिसने उस्ताद बिस्मिल्लाह खां को भारतरत्न दिया, उसी ने शहनाई को भुला दिया। किसी विश्वविद्यालय में उसकी पढ़ाई नहीं होती।
शहनाई वादक रमाशंकर के पुत्र अतुल शंकर काशी हिंदू विश्वविद्यालय के संगीत एवं मंच कला संकाय से बांसुरी में शोध कर रहे हैं। जवाहर लाल के पुत्र राकेश ने भी खानदानी साज शहनाई पर बांसुरी को तरजीह दी। इस बाबत वह कहते हैं कि राकेश कि शहनाई में दम ज्यादा लगता है और दाम कम मिलते हैं। पं. श्यामलाल के बेटे मनोहर लाल शहनाई और बांसुरी दोनों बजाते है। पं. हरिप्रसाद चौरसिया को जिस पं. भोलानाथ प्रसन्ना ने बांसुरी की सरगम सिखाई, वह शहनाई भी बजाते थे। उनके भतीजे सुनील प्रसन्ना बांसुरी और शहनाई दोनों बजाते हैं लेकिन बेटे अजय प्रसन्ना बांसुरी वादक हो गए हैं। कृष्णराम चौधरी के बेटे पवन को भी पिता की शहनाई की जगह बांसुरी ही पसंद आई। शहनाई वादक सोहन लाल के बच्चे भी बांसुरी ही बजा रहे हैं। सितारवादक पं. वीरेंद्रनाथ मिश्र के मुताबिक, शहनाई किसी विश्वविद्यालय में नहीं है। डिग्री बांसुरी में ही मिलेगी। ऐसे में पारंपरिक शहनाई वादक के परिवार के बच्चों के लिए क्या विकल्प रह जाता है? बकौल पुंडलीक कृष्ण भागवत, बांसुरी में रोजगार के अवसर अधिक होने के कारण लोगों की उसमें दिलचस्पी बढ़ी है। शहनाईवादक जवाहर लाल पूछ बैठते हैं कि मंच नहीं मिलेगा तो कोई शहनाई सीख कर क्या करेगा? बांसुरी वादक फिल्मी, लाइट और क्लासिकल बजाते हैं। साथ ही उन्हें कालेजों और विश्वविद्यालयों में भी नौकरी मिलती है। उस्ताद बिस्मिल्लाह खां के निधन के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने शहनाई एकेडमी बनाने की घोषणा की थी लेकिन इस पर अमल नहीं हुआ।
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