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नर्सरी ही सूख जाएगी तो पदक कहां से मिलेंगे

Varanasi

Updated Wed, 08 Aug 2012 12:00 PM IST
वाराणसी। सवा अरब लोगों का देश लंदन ओलंपिक में एक अदद स्वर्ण पदक के लिए तरस रहा है। खिलाडि़यों की नर्सरी तो उनका स्कूल है। जब स्कूलों में ही खेलों को प्रोत्साहन नहीं मिलेगा तो पदक के लिए तरसना तो पड़ेगा ही। सरकार की नीतियां ऐसी हैं कि खेलों की नर्सरी बंजर हो रही है। माध्यमिक स्कूलों की हालत तो सबसे ज्यादा बदतर हैं। कई स्कूलों के पास तो अपना खेल मैदान ही नहीं है। जिनके पास मैदान हैं उनके पास संसाधन का टोटा है। ऐसे में खिलाडि़यों की नई पौध कहां तैयार होगी, यह सबसे ज्वलंत सवाल है। सूबे के ज्यादातर माध्यमिक स्कूलों की तस्वीर कमोवेश एक जैसी है। हकीकत यह है कि जिन स्कूलों में व्यायाम शिक्षक नियुक्त हैं, वहां उनकी भागीदारी खेल से ज्यादा कहीं अन्य दूसरे कामों में है। ज्यादातर तो अलग-अलग विषयों के प्रवक्ता हो गए हैं।
संसाधनों की कमी की वजह से माध्यमिक स्कूलों में खेल का स्तर लगातार गिर रहा है इससे हरिश्चंद्र इंटर कालेज के प्रधानाचार्य प्रमोद कुमार सिंह भी इत्तेफाक रखते हैं। उन्होंने कहा कि जब स्कूल के पास मैदान ही नहीं हैं तो बच्चे खेलेंगे कहां? खेल के नाम पर सिर्फ रश्मअदायगी ही हो रही है। विद्यालय के पास खेल के लिए अलग से कोई फंड भी नहीं होता। ऐसे में खेलों की गतिविधियां बढ़े तो कैसे बढ़ें? कमलाकर चौबे आदर्श सेवा विद्यालय इंटर कालेज के प्रधानाचार्य रमाकांत मिश्र की मानें तो साल में 40 से 45 हजार रुपये क्रीड़ा शुल्क में जमा होते हैं। इतने पैसे से तो किसी एक खेल का भी खर्चा नहीं निकल सकता। सीएम एंग्लो बंगाली इंटर कालेज के प्रधानाचार्य डा. विश्वनाथ दुबे इनसे अलग राय रखते हैं। उन्होंने कहा कि पिछले डेढ़ दशक में स्कूली खेलों का स्तर गिरा है। यह कहने में संकोच नहीं कि खेल अध्यापकों में पहले जैसा जुनून ही नहीं रहा। शिक्षकों में समर्पण और प्रेरणा दोनों का अभाव है।
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