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कीर्तिमानों से भरा रहा गुलजारा का ओलंपिक सफर

Varanasi

Updated Sat, 04 Aug 2012 12:00 PM IST
वाराणसी। सामान्य कद काठी के मजबूत इरादों वाले इंसान थे सरदार गुलजारा सिंह। पंजाब के संगरूर में 29 अक्तूूबर 1920 को जन्मे इस ओलंपियन का काफी समय बनारस में बीता। 1935 में स्कूल गेम्स में खेल की दुनिया में कदम रखने वाले गुलजारा दो दशक तक भारत के शीर्ष मैराथन धावकों में शुमार रहे। 1946 में लौहार में हुए स्कूल गेम्स में उन्होंने भारत के लिए पदक जीता था। 1940 से 46 तक वह लगातार 3000 मीटर की दौड़ में देश के शीर्ष धावक रहे। इस दौरान उन्हें इंडोनेशिया में 1946 में हुए फैमिली गेम्स में भी भारत का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला।
1951 में 3000 मीटर की दौड़ में राष्ट्रीय कीर्तिमान बनाने वाले गुलजारा सिंह को 1952 के हेलसिंकी ओलंपिक में भाग लेने का मौका मिला। यहां 3000 मीटर की दौड़ नौ मिनट 12 सेकेंड में तय कर वह नौवें स्थान पर रहे। वह एक बार फिर 1958 में सुर्खियों में आए, जब उन्होंने मैराथन में 2 घंटे 25 मिनट और 12 सेकेंड के समय के साथ नया राष्ट्रीय रिकार्ड बनाया। भारतीय रेलवे से जुड़ने के बाद उन्होंने 1958 में अखिल भारतीय अंतर रेलवे एथलेटिक्स चैंपियनशिप में हिस्सा लेते हुए पांच हजार मीटर, 10 हजार मीटर और मैराथन में रिकार्ड समय के साथ स्वर्णिम कामयाबी हासिल की। इसी साल कटक में हुए मैराथन दौड़ में उन्होंने विश्व रिकार्ड की बराबरी कर तहलका मचा दिया। 1958 में टोकियो में हुए एशियन गेम्स में वह मैराथन दौड़ में तीसरे पायदान पर रहे। 1960 में वह भारत के सर्वश्रेष्ठ एथलीट के सम्मान से नवाजे गए। उन्होंने 1960 के रोम ओलंपिक के लिए भी क्वालीफाई किया था लेकिन चोटिल होने के कारण वह ओलंपिक में भाग नहीं ले सके। 1963 में यूपी ओलंपिक गेम्स में उन्होंने पांच हजार मीटर, 10 हजार मीटर के साथ ही मैराथन में रिकार्ड समय के साथ स्वर्ण पदक जीता था। भारतीय सेना से जुड़ने के दौरान गुलजारा ने बर्मा (अब म्यांमार) वार में लड़ाकू सिपाही की भूमिका निभाई थी। फरवरी 2002 में सड़क हादसे में गंभीर रूप से जख्मी होने के बाद उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया। उनका परिवार अब भी वाराणसी के चितईपुर स्थित इंदिरा नगर कालोनी में रहता है।
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