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गंगा प्रदूषण में यूपी नंबर-वन

Varanasi

Updated Tue, 19 Jun 2012 12:00 PM IST

वाराणसी। पृथ्वी पर अमृत की पर्याय मानी जाने वाली गंगा को प्रदूषित करने में यूपी सबसे आगे है। जिन पांच राज्यों से होकर पतित पावनी गुजरी हैं उनमें से अकेले 70 फीसदी घरेलू और औद्योगिक अवजल सिर्फ यूपी के तटीय गांवों, कसबों और नगरों से बहाया जा रहा है। इस लिहाज से दूसरे नंबर पर बिहार, तीसरे पर पश्चिम बंगाल और क्रमश: चौथे, पांचवें पायदान पर हैं उत्तराखंड और झारखंड। यह रिपोर्ट भारत-तिब्बत सीमा पुलिस के ताजा सर्वेक्षण पर आधारित है। चिता की राख, हड्डियों के के अलावा शवों को बहाए जाने से गंगा सर्वाधित प्रदूषित हुई है। गंगोत्री से पश्चिम बंगाल तक का सफर सोमवार को पूरा करने वाली आईटीबीपी की टीम ने अमर उजाला से चौंकाने वाली जानकारियां साझा कीं।
गंगोत्री से 23 अप्रैल को डीआईजी एसएस मिश्र के नेतृत्व में 2525 किमी लंबी गंगा की प्रदूषण का आकलन करने निकली आईटीबीपी की 12 सदस्यीय टीम ने सोमवार को पश्चिम बंगाल के डायमंड हारवर पहुंचने पर गंगा के ताजा हालात का सच जाहिर किया। पता चला कि गोमुख से निकली गंगा भागीरथी से जुड़कर देवप्रयाग में अलकनंदा से मिलने तक करीब 180 किमी तक सचमुच अमृत के समान है। ऋषिकेष तक निर्मलता के दर्शन होते हैं लेकिन हरिद्वार से आगे मैदानी इलाके में प्रवेश करते ही नदी प्रदूषण की चपेट में आ जाती है। कारखानों के रासायनिक अवजल के अलावा शहरों के नाले खुलेआम गंगा में बहाए जा रहे हैं। बिजनौर के बाद गंगा में जल की राशि न के बराबर नजर आई। हर शहर से नाला गंगा में बहता मिला। सिर्फ कन्नौज से कानपुर के बीच पांच सौ से अधिक गांवों, कसबों के श्मशान गंगा प्रदूषण के अहम कारण हैं। इन श्मशानों से रोजाना बड़ी मात्रा में लकडि़यों की राख के अलावा मृतकों की चारपाई, बिस्तर और कपड़े गंगा में बहाने की परंपरा का पता चला। 600 से अधिक शव धारा में सड़कर बहते नजर आए। कानपुर, इलाहाबाद, मिर्जापुर से वाराणसी के बीच गंगा नाले रूपी अवजल में तब्दील नजर आई। इलाहाबाद में गंगा से अधिक जलराशि यमुना में पाई गई। बिहार में सहायक नदियों गंडक, घाघरा, कोसी और सोन के मिलने से गंगा में तेज प्रवाह के साथ गहराई भी पाई गई है। झारखंड में सिर्फ 70 किमी तटीय सीमा मिलने से वहां नाममात्र का प्रदूषण पाया गया। पश्चिम बंगाल में कोलकाता के शहरी नालों से गंगा को झटका लगा है लेकिन बाकी स्थानों पर स्थिति यूपी से सुदृढ़ पाई गई।

गंगा में बहने वाले अवजल की स्थिति राज्यवार प्रतिशत में
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उत्तराखंड यूपी बिहार झारखंड पश्चिम बंगाल
3 फीसदी 70 फीसदी 15फीसदी 2 फीसदी 10 फीसदी

04 अहम कारण प्रदूषण के
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-कारखानों का सीधे बहाया जाने वाला रासायनिक कचरा
-शहर, गांव, कसबों के नालों का गंगा में बहाव
-तटीय श्मशान से चिताओं की बहने वाली राख और शव
-तटीय तीर्थों से भारी मात्रा में बहाया जाने वाला फूलमाला का निर्माल्य

बयान
गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के लिए सरकारी स्तर पर ठोस प्रयासों के साथ ही बेसिन में रहने वाली आबादी और खास तौर से तीर्थ में पुण्य अर्जित करने के लिए आने वाले श्रद्धालुओं को जागरूक करने की जरूरत है। जागरूकता के बल पर काफी हद तक गंगा को प्रदूषण से मुक्त किया जा सकता है- एसएस मिश्र, डीआईजी इंडो-तिब्बत बार्डर पुलिस और सर्वक्षण टीम के लीडर

...और लक्ष्य पर निकला अविरल गंगा रथ
वाराणसी। गंगा को अविरल-निर्मल बनाने का आंदोलन काशी से 14 जनवरी को शंकराचार्य स्वरूपानंद की प्रेरणा से आरंभ हुआ। गंगा सेवा अभियानम के सार्वभौम संयोजक स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के निर्देशन में सात तपस्वी अन्न-जल त्याग कर अविरलता-निर्मलता के हठ पर अडिग हुए। 14 जून को अभियानम के सार्वभौम संयोजक के नेतृत्व में गोस्वामी तुलसी दास की तपस्थली अस्सी घाट से 150 वाहनों के साथ अविरल गंगा रथ दिल्ली के लिए कूच किया।

14 जून 1986 को बनारस के राजेंद्र प्रसाद घाट से शुरू हुई गंगा कार्ययोजना के तहत खर्च पर एक नजर
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फर्स्ट फेज:
462 करोड़ चार हजार रुपये कुल धनराशि

राज्यवार आवंटन
181.86 करोड़ पश्चिमबंगाल
53.29 करोड़ बिहार
184.84 करोड़ यूपी

सेकेंड फेज
439 करोड़ रुपये कुल धनराशि खर्च हुई
गंगा कार्ययोजना के दोनों चरणों में निर्मलीकरण पर खर्च धनराशि 901 करोड़ रुपये




गंगा : कोलिफार्म, फीकल, बीओडी सब बढ़ा
मातृसदन की ओर से लोक विज्ञान संस्थान देहरादून के वैज्ञानिकों द्वारा कराए गए सर्वे रिपोर्ट के अनुसार हरिद्वार से पहले गंगा में बीओडी की स्थिति 8.1 मिलीग्राम मापी गई। जबकि हरकी पैड़ी पर यह मात्रा 9.9 मिलीग्राम पायी गई। नीलधारा में बीओडी की मात्रा 14.5 मिलीग्राम और जगजीतपुर में बीओडी की मात्रा 44.7 मिली ग्राम पायी गई।




जीवनदायिनी गंगा को बचाने की जंग
नई दिल्ली/देहरादून/वाराणसी। गंगा देश की प्राकृतिक संपदा ही नहीं, लोगों की भावनात्मक आस्था का आधार भी है। वैज्ञानिक मानते हैं कि इस नदी के जल में वैक्टीरियोफेज नामक विषाणु होते हैं, जो जीवाणुओं व अन्य हानिकारक सूक्ष्मजीवों को नष्ट कर देते हैं। गंगा की इस असीमित शुद्धीकरण क्षमता के बावजूद इसका प्रदूषण रोका नही जा सका है। जबकि 1985 से शुरू गंगा एक्शन प्लान के क्रियान्वयन पर लगभग एक हजार करोड़ खर्च हो चुके हैं।
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ऐसे बढ़ा प्रदूषण
-गोमुख से लेकर गंगासागर तक 31 करोड़ लोगों के रोजी रोटी से जुड़ी जीवनदायिनी गंगा में दो करोड़ 90 लाख लीटर प्रदूषित कचरा प्रतिदिन गिर रहा है।
- इसमें 80 फीसदी घरेलू व 20 फीसदी जहरीला औद्योगिक कचरा है।
-गंगा पर 70 बांध हैं। गंगा घाटी में कुल 760 ऐसी औद्योगिक इकाइयां हैं जो गंगा में बहुत ज्यादा प्रदूषण फैला रही हैं।
-विश्व वैंक की रिपोर्ट के अनुसार यूपी की 12 फीसदी बीमारियों की वजह प्रदूषित गंगा है।
-पीपुल साइंस इंस्टीट्यूट के अध्ययन केअनुसार हरिद्वार में गंगा के जल में कोलिफार्म की मात्रा 5500 निकली, जबकि पीने के पानी के लिए इसका मानक 50 और कृषि कार्यों के लिए 5000 निर्धारित है।
-कुछ ऐसा ही हाल फीकल कोलिफार्म को लेकर है। सेंट्रल पाल्यूशन कंट्रोल बोर्ड का फीकल कोलिफार्म के लिए तय मानक 500 एमपीएन/100 एमएल का है, लेकिन हरिद्वार में तीन स्थानों से लिए गए सैंपल्स में इसकी संख्या दुगुने-तिगुने से भी ज्यादा होने की पुष्टि कर रहे हैं।
-वैज्ञानिक जांच के अनुसार गंगा का बॉयोलाजिकल ऑक्सीजन स्तर 3 डिग्री (सामान्य) से बढ़कर 6 डिग्री हो चुका है। गंगा को बचाने के क्रम में ही इसे राष्ट्रीय धरोहर भी घोषित किया जा चुका है।

गंगा को बचाने की लड़ाई
-गंगा की रक्षा के लिए मातृसदन के संत स्वामी निगमानंद की अनशन करते हुए 13 जून 2011 को मौत हो गई थी।
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आशंका
-यूएन क्लाइमेट रिपोर्ट, 2008 के अनुसार वर्ष 2030 तक गंगोत्री ग्लेशियर लुप्तप्राय हो जाएगा और गंगा मानसून के भरोसे रह जाएगी। गंगा कार्ययोजना शुरू होने के बावजूद 30 वर्षों बाद गंगा में प्रदूषण की मात्रा 28 फीसदी तक बढ़ गई।
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शुद्धीकरण संयंत्रों का विवरण
नगर संयंत्रों की संख्या क्षमता
हरिद्वार 3 24.33
फर्रुखाबाद 1 2.70
कानपुर 4 171
इलाहाबाद 1 60
वाराणसी 3 100
मिर्जापुर 1 14
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हरिद्वार में गंगा को लेकर आंदोलन (जरूरी नहीं)
गंगा रक्षा को लेकर आंदोलनों का उत्तराखंड में केंद्र मुख्य तौर पर हरिद्वार ही रहा है। सामाजिक संस्थाएं और साधु-संत गंगा की रक्षा के लिए लगातार आंदोलन करते रहे हैं। गंगा की रक्षा के लिए मातृसदन के संत स्वामी निगमानंद लंबे अनशन के दौरान अपनी जान गंवा चुके हैं। निगमानंद ने 19 फरवरी 2011 से अनशन शुरू किया था। अनशन करते हुए स्वामी निगमानंद सरस्वती ने 13 जून 2011 को अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया था।
1998 में भी मातृसदन के दो संत स्वामी गोकुलानंद सरस्वती तथा स्वामी निगमानंद सरस्वती कुंभ क्षेत्र को गंगा की धारा से होकर किसी भी वाहन के होकर गुजरने पर प्रतिबंध लगाने की मांग को लेकर अनशन पर बैठे थे। तब से अब तक 33 बार मातृसदन के संतों ने समय समय पर गंगा संरक्षण के मसले पर संघर्ष किया। वर्ष 2009 में स्वामी स्वरूपानंद के दो शिष्य भी सुभाषघाट पर गंगा की रक्षा के लिए अनशन पर बैठे थे।
वर्ष 2009 में गंगा बचाओ अभियान के तहत जलपुरुष राजेंद्र सिंह, पर्यावरणविद् सुंदरलाल बहुगुणा, डॉक्टर अनिल जोशी आदि गोमुख और आसपास के क्षेत्रों में जनजागरण मुहिम चलाई थी।
स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद उर्फ प्रोफेसर जीडी अग्रवाल 9 फरवरी से 8 अप्रैल 2012 तक हरिद्वार में मातृसदन परिसर में अनशन पर बैठे रहे। इससे पहले उन्होंने 20 जुलाई 2010 से 24 अगस्त 2010 तक मातृसदन में अनशन किया था। इसके पहले उत्तरकाशी में 2008 में भी अग्रवाल आमरण अनशन पर बैठे थे। हालांकि यूकेडी के विरोध के कारण उन्हें यहां से जाना पड़ा था।
जीडी अग्रवाल के अनशन का ही परिणाम है कि प्रदेश की तीन परियोजनाओं पाला मनेरी, भैरोंघाटी, लोहारीनागपाला का काम बंद हो चुका है।
परियोजनाओं के समर्थन में भी यदा-कदा आवाज उठती रही है। संगठित तौर पर उत्तराखंड क्रांति दल परियोजनाओं के समर्थन में आवाज बुलंद करता रहा है। अब रूलक के अध्यक्ष पद्मश्री अवधेश कौशल और वरिष्ठ साहित्याकर पद्मश्री लीलाधर जगूड़ी भी परियोजना विरोधियों के खिलाफ खड़े हैं।
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