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प्रलय-प्रेम के तटबंधों पर जीवंत हुई ‘कामायनी’

Varanasi

Updated Mon, 18 Jun 2012 12:00 PM IST
प्रलय-प्रेम के तटबंधों पर जीवंत हुई ‘कामायनी’
संकुल के मुक्ताकाशीय मंच पर प्रसाद की अमर कृति का मंचन
वाराणसी। प्रलय के बाद प्रेम, विरह और मानवता के सृजन संदर्भों को जब संगीतमय संवाद मिला तो कुछ देर के लिए भावों की भाषा हर मन का तटबंध बन गई। रंगमंच पर सचमुच जीवन और उसके पार की परिभाषा गढ़ी जा रही थी। रविवार की रात यह एहसास पैदा हुआ जयशंकर के महाकाव्य ‘कामायनी’ पर आधारित नृत्य नाटिका के मंचन से। सांस्कृतिक संकुल के मुक्ताकाशीय मंच पर यह प्रस्तुति सांस्कृतिक संस्था ‘रूपवाणी’ की ओर से की गई।
ध्वनि-प्रकाश से सुसज्जित मंच पर लयात्मकता और अभिनय केभाव-संचार को ही शुरू से अंत तक प्रधानता मिल सकी। प्रलय के बाद मनु का मन सृजन की बजाय आखेट, यज्ञ, सुरा, बलि जैसे विषयों में लगने के बाद की स्थिति से ही नाटक में रोमांचकारी बदलाव खड़े होने लगते हैं। मनु तुम श्रद्धा को गए भूल/जो क्षण बीते सुख-साधन के...। श्रद्धा को भूलने के बाद असुर पुरोहितों के चक्कर में भटके मनु का संवाद भी कम तार्किक नहीं लगता। वह कहता है- तुच्छ नहीं है अपना सुख ही कि श्रद्धे वह भी कुछ है/ दो दिन के इस जीवन का तो वही चरम सब कुछ है...। देवों को अर्पित मधु-मिश्रित सोम अधर से छूलो/ मादकता बोली पर प्रेयसि आओ मिलकर झूलो...। श्रद्धा जवाब देती है- मनु, क्या यही तुम्हारी होगी उज्जवल मन मानवता/ जिसमें सबकुछ ले लेना हो हंत बची क्या शवता... जैसे संगीतमय संवाद महाकवि की कालजयी काव्य परिकल्पना को साकार कर रहे थे। कभी रानी इड़ा के दरबार का मोहक संगीत झंकृत कर रहा था तो कभी नेपथ्य से आने वाले रोमांचक दृश्य। इससे पहले संकट मोचन फाउंडेशन के अध्यक्ष प्रोफेसर वीरभद्र मिश्र ने संगीत निर्देशक अरविंद दास को सम्मानित कर उद्घाटन किया। रूपवाणी की शकुंतला शुक्ला, एनएसडी के प्रोफेसर केएस राजेंद्रन, प्रोफेसर संजय कुमार, प्रोफेसर राजकुमार, प्रोफेसर आशीष त्रिपाठी, प्रोफेसर बलराज पांडेय, क्षेत्रीय पर्यटन अधिकारी दिनेश कुमार, अनूप अरोड़ा समेत शहर के जानेमाने रंगकर्मी, साहित्यकार, पत्रकार उन क्षणों के साक्षी बने। परिकल्पना धीरेंद्र मोहन की थी और निर्देशन किया व्योमेश शुक्ल ने।
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