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माला-फूल और बेल पत्र से बनेगी जैविक खाद

Varanasi

Updated Thu, 03 May 2012 12:00 PM IST
लोहता। बाबा विश्वनाथ को प्रसाद के रूप में चढ़ने वाले बेल पत्र और माला-फूल से अब किसान जैविक खाद तैयार करेंगे। इससे न सिर्फ बंजर हो रही किसानों की भूमि में सुधार होगा बल्कि पैदावार भी दोगुनी होने की संभावना है। फिलहाल पायलट प्रोजेक्ट के रूप में टडि़या से इसकी शुरुआत होने जा रही है। यदि कृषि विभाग की यह योजना सफल होती है तो पूरे जनपद के लिए जैविक खाद बनवाई जाएगी।
काशी विश्वनाथ मंदिर में प्रतिदिन छह से सात कुंतल बेल पत्र और माला-फूल चढ़ता है। पहले इसे गंगा में प्रवाहित कर दिया जाता था, मगर तीन साल पहले जब गंगा में माला-फूल फेंकने पर रोक लगा दी गई तो बनारस हिंदू विश्वविद्यालय ने 2009 से इसे लेना शुरू कर दिया। इसकी ढुलाई के लिए मंदिर की तरफ से 211 रुपये भी मिलते थे। बीएचयू इसका इस्तेमाल जैविक खाद बनाने में करने लगा, मगर माला-फूल के सड़ने से निकलने वाली दुर्गंध से बीएचयू कैंपस में रहने वालों को दिक्कत होने लगी। उन्होंने विरोध शुरू कर दिया तो बीएचयू प्रशासन ने कमिश्नर चंचल तिवारी को पत्र लिखकर कैंपस में रह रहे लोगों की दिक्कत को देखते हुए माला-फूल और बेेल पत्र लेने से इंकार कर दिया।
इस स्थिति में माला-फूल और बेल पत्र के निस्तारण के लिए कमिश्नर ने वाराणसी मंडल के संयुक्त कृषि निदेशक आरपीएस तोमर और उद्यान उपनिदेशक डा.भूपेंद्रबीर सिंह के नेतृत्व में जिले के पांच किसानों की बैठकर बुलाई थी। इसमें मोहन सराय के टडि़या गांव के किसान श्रीप्रकाश सिंह प्रतिदिन माला-फूल और बेल पत्र लेने को तैयार हो गए। उन्होंने ढुलाई के लिए मिलने वाले 211 रुपये के अलावा आने वाला अन्य खर्च उठाने की भी सहमति प्रदान कर दी। ऐसे में टडि़या से पायलट प्रोजेक्ट शुरू करने का रास्ता साफ हो गया। इस बाबत संयुक्त कृषि निदेशक आरपीएस तोमर का कहना है कि यदि यह योजना सफल होती है तो किसानों को जागरूक कर पूरे जनपद के लिए जैविक खाद बनवाने का लक्ष्य तय किया जाएगा। उन्होंने बताया कि एक बार खेत में जैविक खाद पड़ जाती है तो यह पांच साल तक मिट्टी को उपजाऊ बनाए रखती है। यह खाद बंजर और ऊसर हो रही जमीन को उपजाऊ बना देती है। इसके इस्तेमाल से फूलों, सब्जियों ही नहीं अन्य फसलों की पैदावार भी दोगुनी हो जाएगी।
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