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106 साल बाद बैंक हो पाया डीसीबी

Unnao

Updated Thu, 01 Nov 2012 12:00 PM IST
उन्नाव। जनपद का सबसे पुराना बैंक डीसीबी 106 वर्ष बाद पूर्णतया बैंक हो पाई है। एक सदी से सेक्शन ग्यारह की परिधि में संचालित इस बैंक को गत सप्ताह रिजर्व बैंक का लाइसेंस मिल गया है। बैंक अब व्यावसायिक बैंकों की तरह किसानों के अलावा व्यापारियों और अन्य जरूरतमंदों को ऋण मुहैया करा सकेगा। यह जानकारी डीसीबी के अध्यक्ष फतेहबहादुर सिंह और महाप्रबंधक एपी अग्रवाल ने पत्रकारों को दी।
फतेहबहादुर सिंह ने बताया कि जिला सहकारी बैंक (डीसीबी) की स्थापना 1906 में हुई थी। यह बैंक किसानों को फसली ऋण मुहैया कराने के उद्देश्य से स्थापित किया गया था। रिजर्व बैंक के मौखिक आश्वासन और सेक्शन-11 अंतर्गत बैंक संचालित हो रहा था। 1994 में बैंक का कारोबार करीब 13 करोड़ रुपए था जो अब बढ़कर करीब डेढ़ अरब पहुंच गया था। बैंक की कार्यशील पूंजी दो अरब से ऊंपर पहुंच गई है। बैंक का कारोबार बढ़ने और बकाएदारी के चलते आरबीआई ने इसी वर्ष 16 मई को उन्नाव जिला सहकारी बैंक सहित प्रदेश की 25 बैंकों के नए कारोबार (नए खाते खोलने) पर रोक लगा दी थी। प्रदेश सरकार की मदद से बैंक ने न केवल बकाया चुका दिया बल्कि रिजर्व बैंक से बैंकिंग का लाइसेंस भी प्राप्त कर लिया है। फतेहबहादुर ने बताया कि अब बैंक में सरकारी संस्थाओं के खाते भी खोले जा सकते हैं। महाप्रबंधक ने बताया कि अब बैंक कृषकों के अलावा व्यवसायिक गतिविधियों, वाहन खरीदने आदि के लिए भी ऋण देगा। इसके अलावा अब हम बैंक की स्कीमों का प्रचार प्रसार भी अन्य व्यावसायिक बैंकों की तरह कर सकेंगे। उन्होंने बताया कि आरबीआई का लाइसेंस मिलने के बाद अब हमारा लक्ष्य 2013 तक सभी बैंक शाखाओं को पूर्ण कंप्यूटरीकृत कर सीबीएस बनाना है। सभी बैंक शाखा मैनेजरों को किसानों को अधिक से अधिक ऋण, नकदी फसली ऋण, खाद और बीज उपलब्ध कराने और नए खाते खोलने के निर्देश दिए गए हैं।


केसीसी से भी कम है डीसीबी का ब्याज
उन्नाव। अभी तक मुख्यत: किसानों का बैंक रहे जिला सहकारी बैंक की शाखाएं हर ब्लाक में हैं। इस बैंक में फसली ऋण केसीसी की ब्याज दर से कम है। डीसीबी में फसली ऋण पर समय पर चुकता करने पर किसान को मात्र तीन फीसदी का ब्याज चुकाना होता है। हालांकि बैंक को 10.70 फीसदी ब्याज मिलता है लेकिन इसका शेष हिस्सा शेष हिस्सा प्रदेश व केंद्र सरकारें चुकाती हैं। प्रचार प्रसार की कमी के कारण ज्यादातर किसानों को इसकी जानकारी नहीं है।


किसानों को सदस्य बनाने पर भी होगा जोर
उन्नाव। एक सदी पुरानी होने के बावजूद जिला सहकारी बैंक से करीब 20 फीसदी किसान ही लाभ ले पा रहे हैं। प्रचार प्रसार न होने और सहकारी समितियों में रसूखदारों का दबदबा होने के कारण आम किसान डीसीबी के सदस्य नहीं बन पाए हैं। बैंक अब अभियान चलाकर ज्यादा से ज्यादा किसानों को भी बैंक से जोडे़गा।
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