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सम्मान को ठेस लगने पर नौकरी भी छोड़ दी थी गालिब ने

Sonbhadra

Updated Sat, 29 Dec 2012 05:30 AM IST
सोनभद्र। फैसला हो ही नहीं पाया, बहुत बातों के बाद, कौन खुलता है यहां कितनी मुलाकातों के बाद। इसी तरह के मुक्तकों और गजलों से नगर का स्वामी विवेकानंद हाल गुरुवार की रात गुलजार रहा। दिल अजीज शायर वसीम बरेलवी ने पूरी रात अपनी गजलों से शमा बांधे रखी। मौका था उर्दू के महान शायर गालिब की जयंती का।
कार्यक्रम की शुरूआत सदर विधायक अविनाश कुशवाहा और मेहमान शायद वसीम बरेलवी के शमा रोशन से हुई। इसके बाद मुख्य अतिथि सदर विधायक ने मौलाना असद उल्ला सिद्दीकी (गालिब) के जीवन परिचय पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि गालिब साहब ने पूरी जिंदगी सम्मान के लिए गुजार दी। उन्होंने ऐसी नौकरी को भी त्याग दिया जो उनके सम्मान में ठेस पहुंचाती। इसके बाद कार्यक्रम संयोजक व मंच के संचालक विकास वर्मा एडवोकेट ने जब दिल अजीज शायर वसीम बरेलवी को मंच पर काब्यपाठ के लिए आमंत्रित किया तो मौजूद श्रोताओं ने उनका तालियों से खैरमकदम किया। बरेलवी ने मुक्तक, शेर और गजलों से शमा बांधनी शुरू की। जैसे-जैसे रात होती गई गालिब जयंती पर आयोजित मुशायरे को और भी ऊंचाई मिलती गई। उनकी रचना हो गया जैसा यहां, ऐसा कहां हो जाएगा, कतरे बोलेंगे और समुंदर बेजुबां हो जाएगा, काफी सराही गई। श्रोताओं की मांग पर वसीम साहब ने कई रचनाएं सुनाईं। बच्चों पर हो रहे जुल्म को भी उन्होंने अपनी रचना के माध्यम से गंभीरता से उठाया। उनकी रचना खौफ के साए में बच्चों को अगर जीना पड़ा, बेजुबां हो जाएगा या बदजुबां हो जाएगा ने श्रोताओं की खूब वाहवाही लूटी। श्रोताओं की मांग पर उनके द्वारा प्रस्तुत की गई रचना सभी को छोड़कर खुद पर भरोसा कर लिया मैने, वो मैं जो मरने को था जिंदा कर लिया मैने सुनाकर लोगों को झूमने के लिए मजबूर कर दिया। इसी तरह से पूरी रात उन्होंने कई रचनाओं से श्रोताओं को नवाजा। वाराणसी से आए डा. जावेद अनवर की रचना मेरे वजूद के सहरा को एक गुलाब तो दे, मेरे लहू की किसी बूंद का हिसाब तो दे भी काफी सराही गई। राबर्ट्सगंज के शायर ने ये बात भूल जा दगा दिया किसने, बेखता ही किसी को सजा दिया किसने समेत कई अन्य रचनाएं सुनाईं। गालिब जयंती की अध्यक्षा साहित्यकार डा. शिवधारी शरण राय ने की। इस मौके पर जेबी सिंह एडवोकेट, नजर अहमद नजर समेत लोग मौजूद थे।
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