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16 सालों से दो सौ परिवार बेघर

Siddhartha nagar

Updated Mon, 23 Jul 2012 12:00 PM IST
सिद्धार्थनगर। नदी का जलस्तर जब बढ़ता है तो दो सौ कुनबे कांप उठते हैं। उन्हें 16 साल पहले का भयावह मंजर याद आता है। उसका और जोगिया ब्लाक के इन परिवारों को 16 साल बाद भी अपना घर नहीं मिल सका। बंधे पर झोपड़ी में इनका गुजर हो रहा है। इन्हें स्थायी घर की आस है पर प्रशासन बेखबर है। एक बार फिर नेपाल में बारिश से जिले की नदियां उफना गई हैं। इन कुनबों के साथ ही पांच दर्जन से अधिक गांवों के ग्रामीण बाढ़ की आशंका से थर्रा गए हैं।
बाढ़ में घर गंवा चुके उसका के हथिवड़ताल के तिवारी टोला के भुआल, मोहरत, बसंत, अंबरीष बांध पर शरण लिए हैं। पांच बच्चों के साथ रह रही भुआल की पत्नी अकालमती कहती हैं कि अब तो गांव में जाने की हिम्मत नहीं होती। संवारी (60) वर्ष 1998 की बाढ़ त्रासदी को भुला नहीं पाई हैं। डर की वजह से आज भी पुराने घर लौट नहीं पाई। 16 वर्षों से अपने दो लड़के और एक लड़की के साथ बांध पर ही जिंदगी गुजार रही हैं। पीड़ितों में रामफल टोला (पनियहवा) के रतन, रामनरेश, नरायन, शिवशंकर, हरिशंकर, रामफल, पारस, राम लखन, कपिल भी शामिल हैं। ये सभी बरसात हो या लू के थपेड़े, बांध पर ही जीवन काटने को मजबूर हैं। इनका कहना है कि गांव में सड़क बिजली होने से ज्यादा जरूरत हम लोगों की बाढ़ से सुरक्षा की है, जिसे प्रशासन आज तक मुहैया नहीं करा पाया। उसका बाजार से उसका लखनापार बांध पर पनियहवा के ग्रामीण बांध पर शरण लिए मिल जाएंगे। विगत 16 वर्ष से इनका परिवार यहीं है। वर्ष 1998 की बाढ़ ने जिले के दर्जनों गांवों के लगभग दो सौ परिवारों को बेघर कर दिया। इनमें हथिवड़ताल के तिवारी टोला, यादव टोला, बंगाली टोला, रामफल टोला और खदेरू टोला के सैकड़ों परिवार शामिल हैं। जोगिया ब्लाक के ग्राम खजुरडाड़ के तीन दर्जन से अधिक परिवार भी बांध पर शरण लिए हैं। इस संबंध में प्रभारी डीएम आरबी सिंह ने कहा कि बाढ़ को लेकर प्रशासन गंभीर है। हम किसी भी स्थिति से निपटने को तैयार हैं, जहां तक विस्थापितों की बात है तो इसके लिए शासन स्तर पर वार्ता चल रही है।
इनसेट
बांध पर ही बस गए दर्जनभर गांव
बाढ़ के भयावह मंजर से बचने के लिए राप्ती और बूढ़ी राप्ती के बीच निचले भूभाग में दर्जनों गांवों के लोग अपना आशियाना बांध पर बनाए हैं। लखनापार बैदौला बांध से गुजरने के दौरान फत्तेपुर गांव दिखाई पड़ेगा। यहां के लोग भी बांध के पास ही अपना आशियाना बनाकर जीवन गुजार रहे हैं। इसी तरह बांध पर रीवांनानकार, गायघाट, झून्की, बगहिया, नटवाताल, मारूखर्ग और अजिगरा समेत दर्जनों गांव ऐसे हैं, जो बांध से सटे दोनों तरफ बसे हैं।
इनसेट
1998 की बाढ़ ने मचाई थी तबाही
वर्ष 1998 की बाढ़ ने विगत 100 सौ वर्षों का रिकार्ड तोड़ दिया था। जिले के 2545 गांवों में 1693 गांव प्रभावित हुए। 1053 गांव जलमग्न हो गए थे। जिले की तत्कालीन 16 लाख 18 हजार आबादी में 11 लाख 65 हजार आबादी प्रभावित हुई थी। कुल कृषि योग्य भूमि 2,45,273 हेक्टेयर में 1,90,495 हेक्टेयर फसल नष्ट हो गई। बाढ़ से 52 लोगों और 481 पशुओं की मौत हो गई थी।
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