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खंडहर में हो रहे ब्रिटिश पीरियड के रेलवे क्वार्टर

Shahjahanpur

Updated Wed, 11 Jul 2012 12:00 PM IST
सौ साल से ज्यादा पुराने हैं रेल कॉलोनियों के 432 आवास
- क्वार्टरों की जर्जर छतें और दीवारें बारिश में कर रहीं परेशान
- अनुरक्षण को स्वीकृत धनराशि से नहीं हो रहा मेंटीनेंस वर्क
अनूप वाजपेयी
शाहजहांपुर। बॉलीवुड के रामसे ब्रदर्स की किसी हॉरर फिल्म जैसी भुतहा इमारतें और वैसी ही डरावनी लोकेशन अपने शहर में तलाशनी हो तो ढका ताल या फिर स्टेशन रोड की रेलवे कॉलोनी चले जाएं। ब्रिटिश पीरियड में बनकर तैयार हुए सौ साल से भी ज्यादा पुराने तमाम क्वार्टर पर्याप्त देखभाल के अभाव में खंडहर बनते जा रहे हैं। इनमें रहने वाले रेल परिवारों को बारिश में आवासों की जर्जर छतें और दीवारें परेशान कर रही हैं। र्क्वाटरों के मेंटीनेंस को उत्तर रेलवे से मिलने वाले ‘अपर्याप्त’ बजट का कायदे से इस्तेमाल नहीं होने से ऐसे आवासों में रहने वालों पर हर समय किसी हादसे का खतरा मंडरा रहा है।
यहां रेलवे के विभिन्न श्रेणियों वाले करीब तीन सौ आवास ढका ताल, गोविंदगंज, टीटीसी, गैंगमैन, स्टेशन रोड आदि कई कॉलोनियों से पहचान रखते हैं। यह सभी आवास ब्रितानी हुकूमत के दौर में सन् 1905 के आसपास बनाए गए थे। गोविंदगंज और स्टेशन के सामने वाली कॉलोनियों में ज्यादातर अफसरों का बसेरा है, इसलिए उनका नियमित अनुरक्षण भी होता रहता है, लेकिन मेंटीनेंस मेें लापरवाही से अन्य कॉलोनियों के ज्यादातर आवास भुतहा हो गए हैं।
एक सदी से भी अधिक समय से मौसम की मार और ट्रेनों की धड़धड़ाहट झेल रहे इन आवासों की मरम्मत को उत्तर रेलवे ने दरवाजे, ब्रिक वर्क, लोहे के गेट, रंगाई-पुताई आदि एक दर्जन से अधिक अनुरक्षण कार्य तय किए हैं, लेकिन बजट कम स्वीकृत होने से दीवारों की पेंटिंग का काम भी नहीं हो पाता। जो बजट मिलता भी है, वह स्टेशन चमकाने पर ज्यादा खर्च हो रहा है। नियमत: हर दो माह में सभी आवासों की भौतिक दशा का सत्यापन करके उसी के अनुरूप काम होने चाहिए, लेकिन क्वार्टरों की मरम्मत होना तो दूर रहा, नल की खराब टोटियां बदलने जैसे मामूली काम भी महीनों टलते रहते हैं।
हाल ही में यहां निरीक्षण को आए डीआरएम एसके माथुर को नार्दर्न रेलवे मेंस यूनियन ने इस बावत ज्ञापन भी दिया था। रेल यूनियनों की लाचारी का यह आलम तब है, जब रेलवे ने आवासों में अनुरक्षण कार्य को यूनियनों के शाखा मंत्रियों से सहमति लेने की व्यवस्था लागू कर रखी है। यहां तैनात सहायक मंडल अभियंता के अधीन बंथरा, कटरा और टिसुआ के आवास खस्ता हो चुकने के कारण परित्यक्त किए जाने योग्य हैं, लेकिन उनमें रहना कर्मचरियों की मजबूरी है।

एसआईजी के खर्च
का नहीं कोई हिसाब
कर्मचारियों को देने वाली सुविधाओं के रखरखाव को रेलवे उनके वेतन से अनुरक्षण व्यय की कटौती भी करती है। महकमे का सर्विस इंप्रूवमेंट ग्रुप (एसआईजी) पगार से कटने वाली धनराशि का हिसाब रखता है और इसी कोष से स्टेशन वार सालाना बजट जारी करता है। स्वीकृत होने वाली धनराशि में रेलवे का 30 फीसदी अंशदान रहता है। नियमानुसार अनुरक्षण मद में वेतन से काटी गई धनराशि संबंधित कर्मचारी के आवास पर व्यय होनी चाहिए, लेकिन इसका भी पालन नहीं हो रहा। कर्मचारी नेताओं के अनुसार एसआईजी से जोन के सभी आवासों की मरम्मत को 16 लाख रुपये स्वीकृत हुए, लेकिन इसके संपूर्ण व्यय का संबंधित अफसरों के पास हिसाब नहीं है।


‘आवास चाहे सरकारी हों अथवा व्यक्तिगत, उनमें रिहायश की एक समय सीमा होती है। चार-पांच दशक बाद निजी मकान भी मरम्मत के अभाव में कमजोर पड़ने लगता है, जबकि रेल आवास सौ साल से भी ज्यादा पुराने हो चुके हैं। मेंटीनेंस वर्क को साल में मिलने वाला बमुश्किल छह-सात लाख रुपये का बजट इतना नहीं होता कि उससे निर्माण कार्य हो सके। हां, रंगाई-पुताई लगातार कराई जा रही है।’
-सीताराम, सहायक मंडल अभियंता, उत्तर रेलवे
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