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जलप्लावित क्षेत्रों में बढ़ेगा मांगुर का कुनबा

Shahjahanpur

Updated Tue, 03 Jul 2012 12:00 PM IST
सिंधौली, पुवायां, खुटार, जलालाबाद, कांट, तिलहर और खुदागंज ब्लाक के लोगों को होगा फायदा
- शासन ने लागू की मत्स्य पालन विविधीकरण योजना
- 300 हेक्टेयर पानी से घिरी जमीन का होगा सदुपयोग
- पूर्व में लागू कैटफिश कल्चर स्कीम का होगा विस्तार
सिटी रिपोर्टर
शाहजहांपुर। मांगुर मछली (कैटफिश) का वंश बचाने को प्रयासरत प्रदेश शासन ने जिले में मत्स्य पालन विविधीकरण योजना लागू करके एक नई पहल की है। खास यह है कि इस एक योजना से कई लाभ जुड़े हैं। पहला यही कि जिले में पानी से घिरी सैकड़ों हेक्टेयर जिस जमीन का अभी तक कोई इस्तेमाल नहीं हो सका, उस पर मत्स्य पालन को तालाब विकसित होने से न सिर्फ भूमि स्वामी लाभान्वित होंगे, मांसाहारियों को मछली और आसानी से सुलभ होगी। इसके साथ ही पहले से लागू कैटफिश कल्चर स्कीम का भी विस्तार हो सकेगा।
वायु श्वांसी प्रजाति की देशी मांगुर विज्ञान जगत में ‘क्लेरियस बैट्रेकस’ नाम से जानी जाती है। जो लोग आहार में मछली लेते हैं, उन्हें कई कारणों से देशी मांगुर बहुत भाती है। अन्य मत्स्य प्रजातियों की तुलना में छोटे आकार की इस मछली में प्रोटीन अधिक होता है। मूंछदार यह मछली कम पानी की उपलब्धता वाले उथले पोखरों और आक्सीजन की न्यूनतम मात्रा वाले खारे पानी में भी आसानी से पनपती है। इस कारण इसमें स्वास्थ्य को लाभकारी अन्य खनिज तत्व भी बहुत होते हैं।
देशी मांगुर की यही विशेषताएं उसकी विलुप्तता का कारण बनने लगी। गांवों के आसपास गंदे पोखरों में पूरे साल आसानी से उपलब्ध होने के कारण मांगुर का शिकार बढ़ा तो उनकी संख्या कम होने लगी। इसे देखते लखनऊ स्थित राष्ट्रीय मत्स्य आनुवंशिक ब्यूरो ने मांगुर को विलुप्तप्राय श्रेणी में शामिल किया तो प्रदेश शासन ने गत वर्ष कैटफिश कल्चर स्कीम लागू की। इसके तहत जिले के पांच ब्लाकों में एक-एक हेक्टेयर के पांच नए तालाब विकसित करके उनमें 20 हजार मछलियां डाली गईं। सूबे के अन्य जिलों में भी उत्साहजनक नतीजे मिले तो शासन ने विविधीकरण की नई योजना लागू की।
इसके तहत ऐसी जमीनों पर मत्स्य पालन को तालाब विकसित होने हैं जो जल रिसाव, जल जमाव और अन्य प्राकृतिक कारणों से जलभराव से घिरी होने के कारण कृषि अथवा बागवानी के लायक नहीं हो। इसलिए योजना में पहले से विकसित तालाब और पोखर शामिल नहीं करने का निर्णय किया गया है। शासन के इस फैसले से सिंधौली, पुवायां, खुटार, जलालाबाद, कांट, तिलहर और खुदागंज ब्लाक में करीब तीन सौ हेक्टेयर में फैले झाबर उपयोगी साबित होंगे।
योजना के तहत मत्स्य पालकों को एक हेक्टेयर भूमि उपलब्ध कराने पर आकर्षक आर्थिक सहायता का प्रस्ताव भी दिया गया है। जलप्लावित भूमि पर एक तालाब विकसित करने पर करीब सवा लाख रुपये लागत आने का अनुमान लगाया गया है। इस धनराशि पर अनुसूचित जाति के लाभार्थियों को 90 फीसदी और सामान्य श्रेणी के भूमि स्वामियों को 80 फीसदी अनुदान दिया जाएगा।


‘मत्स्य पालन को बढ़ावा देने के लिए शासन बेहद गंभीर है। इसलिए कैटफिश कल्चर स्कीम के अच्छे नतीजे मिलने के बाद विविधीकरण की नई योजना लागू की गई है। इस योजना का लाभ वह हर व्यक्ति ले सकता है जिसके पास कम से कम एक हेक्टेयर ऐसी जमीन हो जिसका जलभराव के कारण किसी भी दृष्टि से इस्तेमाल नहीं हो रहा हो। इससे खाली जमीनों का व्यवसायिक प्रयोग हो सकेगा जो आमदनी बढ़ाने का जरिया बनेगा।’
- डीएस बघेल, सहायक निदेशक (मत्स्य)
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