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...मौत के लगकर गले भी मेरा वजूद बोलेगा

Raebareli

Updated Mon, 10 Dec 2012 05:30 AM IST
रायबरेली। शायद यही वो जज्बा था जिसके बल पर देश को आजादी दिलाने और फिर इस आजादी को अक्षुण्य बनाये रखने के लिए न जाने कितने वीर सपूतों ने हंसते-हंसते अपनी जान न्योछावर कर दी। उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि जिस देश की खातिर वे अपना लहू बहा रहे हैं, आने वाले समय में राजनीति और लालफीताशाही की दोधारी तलवार का शिकार उनके परिजन होंगे। जिस सम्मान की दरकार पूर्व सैनिकों या उनके परिजनों को है वह उन्हें मिलना तो दूर बल्कि उन्हें उपेक्षा का दर्द झेलना पड़ रहा है। प्रशासनिक उपेक्षा का यह दर्द रविवार को एसजेएस स्कूल में आयोजित सम्मान समारोह के दौरान पूर्व सैनिकों और उनके परिजनों की आंखों में साफ दिखाई दिया।
भारत-पाक युद्ध की याद जेहन में आते ही मो. शफीक के चेहरे पर चमक आ जाती है। शहर के चकभीखमपुर निवासी मो. शफीक भारत-पाक युद्ध की याद को ताजा करते हुए बोले कि पाकिस्तान के हमले का करारा जवाब देते हुए ब्रिगेडियर और जनरल को गोलियों से छलनी कर दिया। जनरल के शव को तो पाकिस्तानी सैनिक अपने साथ उठा ले गए, लेकिन ब्रिगेडियर के शव को लाकर भारतीय सेना के सुपुर्द कर दिया। उनकी इस वीरता पर सेना ने सम्मानित किया था। यहां तक की पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने भी पीठ थपथपाते हुए सम्मानित करने की घोषणा की थी। इसके बाद लगातार उपेक्षा ही की जा रही है। आज भी उन्हें कोई खास रियायत नहीं मिली। अब्दुल हमीद के जीवन पर लिखी पुस्तक में अपने साथी पिंडारीकला अमावां नौशाद के साथ अपनी फोटो को दिखाते हुए कहा कि सरकार ने तो सिर्फ वादे ही किए। बोले कि हमें तो लोग भी मानों भूलते ही जा रहे हैं। शहीद रामसिंह चौहान की पत्नी अमरावती कहती हैं कि सीमा पर मेरे पति ने परिवार की मोह, माया को त्यागकर दुश्मनों को करारा जवाब दिया। दुश्मनों के घिरने के बाद भी हौसला पस्त नहीं हुआ और कइयों को मारकर अंत में शहीद हो गए। उनके जाने का गम तो आज भी परिजनों को है लेकिन उन्हें सबसे बड़ी पीड़ा प्रशासनिक उपेक्षा से है। उनका कहना है कि सरकार ने शहीद परिजनों को आठ बीघा जमीन देने की घोषणा की थी। आज तक नहीं मिली। अफसरों की चौखट घिसते हुए तीस साल हो गए, अब तो आस ही खत्म होती जा रही है।
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