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कुछ दिन सख्‍ती, फिर ढाक के तीन पात

Raebareli

Updated Fri, 28 Sep 2012 12:00 PM IST
रायबरेली। सांसद सोनिया गांधी का संसदीय क्षेत्र और फिर अयोध्या में हुए ढांचा ध्वंस जैसे मामलों की यहीं पर चल रही सुनवाई के बाद दीवानी कचहरी और तहसील की अदालतें महफूज नहीं हैं। जरायम की दुनिया के सरताजों के आगे सुरक्षा व्यवस्था खोखली नजर आती है। कई बार शातिर अपराधियों ने दीवानी कचहरी की सुरक्षा व्यवस्था में सेंध लगाई है। घटना के कुछ दिनों तक सचेत रहने वाली पुलिस फिर पुराने ढर्रे पर आ जाती है। यही ढिलाई अपराधियों को अपराध करने से नहीं रोक पाती। इसको लेकर पुलिस अधिकारी सख्ती बरतने का दावा तो करते हैं, लेकिन वह हकीकत में नहीं बदल पाते है।
पहले हम दीवानी कचहरी सुरक्षा की बात करते हैं, जहां प्रवेश करने के लिए तीन गेट हैं। कानपुर रोड पर दो गेट, जबकि कचहरी रोड पर एक गेट है। बुधवार को लॉकअप के अंदर के बाद भी गुरुवार को सुरक्षा व्यवस्था में ढिलाई देखी गई। तीनों गेटों से लोग बेरोकटोक आते जाते दिखे तो पेशी पर आए बंदी सिपाहियों के साथ हंसते हुए कोर्ट तक पहुंचाए जाते देखे गए। यही नहीं कचहरी के अंदर बेतरतीब तरीके से वाहन खड़े किए जाते हैं, लेकिन इस पर अंकुश लगाने की जहमत नहीं उठाई है। सुरक्षा की दृष्टि से दीवानी कचहरी में पीएसी तो तैनात है, लेकिन वह कोर्ट की सुरक्षा तक सीमित है। इसके अलावा अन्य पुलिस कर्मियों की तैनाती नहीं की जाती है। कई साल पहले चौकी स्थापित की गई थी, जिसका अस्तित्व अब समाप्त हो गया है। सुरक्षा में ही चूक की वजह रही कि वर्ष 2003 में लॉकअप के अंदर ही बंदी अनवर की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। यही नहीं पेशी पर आए कई बंदी भाग भी चुके हैं। हर बार सुरक्षा में चूक होने के बावजूद पुलिस गंभीर नहीं होती है। यही हाल डलमऊ, लालगंज, सदर, महराजगंज, ऊंचाहार तहसील की लॉकअप का है। बंदियों को बंदी गृह में बंद तो कर दिया जाता है, लेकिन वहां पर किसी पुलिस वाले की तैनाती नहीं की जाती है। बंदी गृह में अव्यवस्था का बोलबाला रहता है। पानी की कमी के साथ ही साफ-सफाई नहीं रहती है। पंखे न लगे होने से गर्मी से बंदियों में गुस्सा रहता है। हालांकि तहसील की अदालतों में सबसे ज्यादा कर्ज लेने वाले ही बंद होते हैं।
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