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मेढ़ावा में गूंज रही गुप्तकालीन सिक्कों की खनक

Pratapgarh

Updated Sat, 24 Nov 2012 12:00 PM IST
प्रतापगढ़। जिले की लालगंज तहसील का मेढ़ावा गांव गुप्त कालीन सिक्कों की खनखनाहट से गूंज रहा है। खेतों की खोदाई के दौरान गुप्त कालीन मूर्तियां और सिक्के मिल रहे हैं। इनका मोल न समझकर ग्रामीणों के साथ ही गांव के बच्चे भी इसे खेलने की चीज समझ रहे हैं।
पुरातत्वविद बताते हैं कि प्रतापगढ़ प्राचीनकाल से धन और अध्यात्म से परिपूर्ण रहा है। राजाओं के कोष में ही नहीं लोग अपना धन जमीन में मटके के अंदर भी रखते थे। अजगरा, पट्टी के बाद इस बात को साबित किया है लालगंज तहसील के मेढ़ावा गांव में मिलने वाले पुरावशेषों ने। गांव के राम नारायण आध्यात्मिक व्यक्ति हैं। उनके आश्रम में पेड़ों को लगाने के लिए हो रही खोदाई में पुरानी मूर्तियां और कुछ सिक्के मिले हैं। मूर्तियों को तो उन्होंने छोटे-छोटे मंदिर बनवाकर रखवा दिया है लेकिन सिक्के ग्रामीण देखने के लिए ले जाते हैं तो वापस ही नहीं करते। मंदिरों में रखे कुछ सिक्के तो बच्चे भी उठा ले गए। इन अमूल्य चीजों की कीमत न जानने के कारण इसे छोटी वस्तु समझकर फेंक देते हैं। जानकारों का मानना है कि प्राचीनकाल में यहां मंदिर या फिर कोई महल जैसी चीज रही होगी।
मेढ़ावा गांव में खोदाई के दौरान मिलने वाली मूर्तियों में एक शिलापट् पर विष्णु भगवान के विराट स्वरूप को दिखाया गया है। लगभग डेढ़ फिट लम्बा और एक फिट चौड़े बादामी रंग के शिलापट पर भगवान के विराट स्वरूप को उभारा गया है। खोदाई में मिलने के बाद इसे पीपल के वृक्ष के नीचे खुले में ही रख दिया गया है। मिट्टी में दबे होने के कारण पत्थर जगह-जगह से टूट गया है लेकिन इस पर उभरी आकृति स्पष्ट है। इसके अलावा एक फिट के शिलापट पर गणपति भगवान और हनुमान की आकृति भी दिखती है।
खोदाई में मिलने वाले सिक्के भी अद्भुत हैं। पीतल के बने इन सिक्कों पर एक तरफ तो भगवान राम सीता सिंहासन पर बैठे हैं और उनके तीनों भाई साथ में खड़े हैं। पैर के पास हनुमान जी भी हर्षित हुए बैठे दिखते हैं। सिक्के की दूसरी तरफ दो सैनिक जैसे लोग भाला लिए थोड़ा टेढ़े होकर खड़े हैं। इस सिक्के को घिसने पर यह सोने जैसा चमकता है। इस पर कुछ लिखा भी है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं हो पाता। लोगों के अनुसार यह पीतल का बना है।
अजगरा स्थित संग्रहालय के संस्थापक और पुरावशेष खोजी निर्झर प्रतापगढ़ी का कहना है कि इस तरह के सिक्कों के प्रयोग का जिक्र गुप्तकाल में आता है। अभी इसकी जांच नहीं की गई है। जांच के बाद इस बारे में पूर्ण जानकारी हो सकेगी।
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