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इन पर नहीं बरस रही लक्ष्मी की कृपा

Pratapgarh

Updated Thu, 01 Nov 2012 12:00 PM IST
प्रतापगढ़। मिट्टी के दीप अब लोगों की आंखों में चमक नहीं पैदा कर पाते। उन्हें मोमबत्ती और बिजली के टिमटिमाते बल्ब की रोशनी रास आ रही है। मिट्टी बर्तन की कलाकारी में माहिर कुम्हारों के चाक की रफ्तार धीमी पड़ गई है। फिर भी दीपावली पर लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए मिट्टी के दीप जलेंगे। इसी उम्मीद में एक मर्तबा फिर चाक की चाल तेज हो गई है। कुंभकारों को आशा है हो सकता ग्राहक देवता की जेब से लक्ष्मी घर प्रवेश करें। मगर महंगाई की तलवार उनके ख्वाबों को कतर रही है। यदि वह पुश्तैनी धंधा छोड़ कुछ और न करें तो चूल्हा जलना मुश्किल है।
कुम्हारों का पुश्तैनी धंधा महंगाई की आग में जलता जा रहा है। लागत ज्यादा इनकम कम से तंग लोगों का मन अब इसमें नहीं लग रहा। महीनों से बेमन काम करने वाले कुम्हारों के चाक इधर बीच तेजी से घूम रहे हैं। नजदीक आई दीपावली से उन्हें कुछ उम्मीद जगी है। जिले के सदरबाजार कोहरौटी, पड़रीजबर, फेनहा, ताला, खभोर आदि गांवों की कुम्हार बस्तियों में मिट्टी के बर्तन बनाने का काम तेज है। इस काम में बूढ़े, बच्चे, युवा सभी मिल कर हाथ बंटा रहे हैं। मिट्टी गीली करना, गूथना, आंवा लगाना और सुधार कर सुरक्षित रखने जैसे काम परिवार के हर सदस्य में बंटे हैं। समय की मांग को देखते हुए कुम्हार दियाली, कलश, ढेड़िया, कसोरा, गणेश लक्ष्मी की प्रतिमा को डिजाइन कर रहे हैं। उसे आकर्षक नीले, पीले, गुलाबी, काले, हरे रंग से सजा रहे हैं। ऐसा वे खरीददारों को लुभाने की गरज से कर रहे हैं। कुछ व्यापारी मिट्टी के वह सामान मानधाता, कुंडा, संग्रामगढ़, लालगंज, पट्टी क्षेत्र से थोक में खरीद कर लाते हैं। कुम्हार बताते हैं कि बिजली की झालरों और मोमबत्तियों के आगे उन सामानाें की चमक फीकी बताते हैं।
दीप पर्व के मद्देनजर चाक डोलाने वाले कुम्हार पूंजी डूबने की आशंका में भी हैं। भुलियापुर के मूर्तिकार शिवप्रताप प्रजापति, भगवती प्रजापति व दियाली बनाने में माहिर मेवालाल, कल्लू, पंकज, संतोष कहते हैं कि करीब पांच साल पहले 300 से 400 रुपए ट्राली मिट्टी कटरामेदनीगंज, जामताली, गड़वारा आदि जगहों से मिल जाती थी। मगर अब एक ट्राली मिट्टी की कीमत एक से डेढ़ हजार रुपये हो गई है। कहते हैं कि एक ट्राली मिट्टी से बने बर्तन को पकाने से लेकर रंगाई और उसे बेंचने तक में करीब बारह से तेरह हजार रुपए की लागत आती है। आंवा लगाने और पकाने में आदमी कम पड़ते हैं। ऐसे में जरूरत के मुताबिक लोगों को भी मजदूरी पर रखना पड़ता है। एक आंवा का बर्तन पकने में बीस से पचीस दिन लगते हैं। जब तक बर्तन नहीं जाते मजदूर के साथ खुद भी खटना पड़ता है।
शहर में कुम्हारों के सामने सबसे बड़ी समस्या जमीन की है। उन्हें मिट्टी के लिए भी भटकना पड़ता है। वे ग्रामीण क्षेत्र से मिट्टी मंगाते हैं। ऐसे में मिट्टी के बर्तनों की लागत काफी बढ़ जाती है। उनके सामने बर्तन बनाने के बाद सुधारने व आंवा लगाने के लिए भी जमीन का संकट है।
परंपरागत बर्तन के साथ कुम्हार मिट्टी के खिलौने भी गढ़ रहे हैं। उन्हें उम्मीद है कि बच्चे आज भी मिट्टी के जांत, घंटी, हाथी, घोड़ा जरूर खरीदेंगे। उनकी इस सोच में आधुनिक प्लास्टिक, कपड़े और लकड़ी खिलौनों के क्रेज की दहशत भी है। यदि वे खिलौने नहीं बिके या सस्ते में बिके तो क्या होगा। इस बात को ध्यान में रखते हुए वे उन खिलौनों को कम बना रहे हैं।
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