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सेहत पर भारी पड़ सकता है पटाखोें का धुआं

Pilibhit

Updated Tue, 13 Nov 2012 12:00 PM IST
पीलीभीत। पटाखों की तेज आवाज और रंग-बिरंगी रोशनी के साथ मिलने वाली खुशी आपको लंबे समय तक शारीरिक और मानसिक परेशानियां दे सकती है। डॉक्टर बताते हैं कि दीवाली के बाद अस्पतालों में आंख, कान, त्वचा, श्वसन तंत्र और मस्तिष्क संबंधी मरीजों की संख्या में भारी इजाफा होता है। वहीं बुजुर्गों और बच्चों की सेहत भी बिगड़ जाती है। जानकारों की मानें तो पटाखों में चारकोल, सल्फर, पोटेशियम नाइट्रेट और बेरियम नाइट्रेट जैसे हानिकारक कैमिकल मौजूद होते हैं। आतिशबाजी के धुएं के साथ यह कैमिकल लोगों के शरीर में पहुंच जाते हैं। इनके संपर्क में आने पर सांस फूलना, पेट दर्द, गैस बनना, खूनी दस्त और चक्कर आने जैसी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं।
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रोशनी, आवाज और केमिकल के प्रभाव
जिला अस्पताल के वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ डॉ केके शर्मा ने बताया कि तेज धमाके वाले बम में खतरनाक विषैले तत्त्व होते हैं। चारकोल, सल्फर, पोटैशियम नाइट्रेट जैसे केमिकल वातावरण में फैलकर कई मानसिक और शारीरिक बीमारियों की वजह बनते हैं। राकेट और स्काई शॉट सरीखे पटाखों में चारकोल, सल्फर, पोटैशियम नाइट्रेट के साथ एलुमिनीयम तत्व भी शामिल होते हैं। अनार और चकरी वाले पटाखों में चारकोल, सल्फर, पोटैशियम नाइट्रेट और बेरियम नाइट्रेट जैसे हानिकारक तत्व मौजूद होते हैं।
आंखों पर असर: धुएं की वजह से आंखों में एलर्जी, आंखों का लाल होना, आंखों में पानी आने जैसी समस्याएं होती हैं।
दिमाग पर असर: हानिकारक केमिकल दिमाग में मसल्स को डिजनरेट करने का काम करते हैं, जिससे मस्तिष्क की तंत्रिकाएं सिकुड़ जाती हैं।
तत्व और उनके हानिकारक प्रभाव- एल्मोनियम की अधिकता किडनी पर असर डालती है। बुजुर्गों को काफी कमजोरी महसूस होने लगती है। सल्फर डाइ ऑक्साइड की अधिकता से जान तक जा सकती है।
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हाई डेसीबल साउंड कानों का खतरा
जिला अस्पताल के ईएनटी डॉ. एसके मित्रा बताते हैं, एक सामान्य व्यक्ति आठ से दस घंटे तक लगातार 85 डेसीबल की ध्वनि सुन सकता है। हम दीवाली के दिन से असामान्य ध्वनि का शोर सुनने लगते हैं। तेज ध्वनि के पटाखों का कानों पर तुरंत असर कान सुन्न हो जाने के रूप में होता है। दीवाली के पटाखे 124 डेसीबल से अधिक ध्वनि के लिए तैयार किए जाते हैं और इन्हें चार मीटर की दूरी से बनाकर रखना सुरक्षित माना जाता है।
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