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टीबी के कई मरीजों पर मंडरा रहा खतरा

Pilibhit

Updated Fri, 26 Oct 2012 12:00 PM IST
पीलीभीत। जिले में टीबी के मौजूदा वक्त में करीब सौ रोगियों के ऊपर मौत मंडरा रही है। तराई के इस जिले में प्रतिवर्ष टीबी के सौ केस बीच में इलाज कराकर छोड़ जाते हैं। ऐसे केसों को एमडीआर (मल्टी ड्रग रेसिस्टेंस पेशेंट ) केस के रूप में चिन्हित किया जाता है। गंभीर हालत होने पर इन पर टीबी की दवाएं (डाट्स कोर्स) असर नहीं करती है।
जिले में हर साल टीबी के करीब तीन हजार मरीज डाट्स प्रोग्राम के तहत रजिस्ट्रेशन कराते हैं। जिनमें करीब 100 मरीज बीच में ही इस कोर्स को छोड़ देते हैं। मरीजों में मौजूद खतरनाक बैक्टीरिया आसपास के लोगों के लिए काफी खतरनाक होते हैं। जनवरी से मार्च तक 600, अप्रैल से जून तक 817, जुलाई से सितंबर 768 और अक्तूबर माह में 138 रोगियों का इलाज किया जा रहा है। हालांकि टीबी में एमडीआर केस का इलाज संभव तो है, लेकिन डाट्स प्लस नाम का यह प्रोग्राम सूबे में अप्रैल 2013 में लागू होगा।
क्या है एमडीआर पेशेंट
टीबी लाइलाज नहीं है। छह से आठ माह का डाट्स कोर्स नियमित रूप से पूरा करने वाले रोगियों में यह मर्ज जड़ से खत्म हो जाता है। लेकिन डाट्स को बीच में छोड़ने वाले रोगियों के लिए टीबी जानलेवा हो सकती है। चिकित्सकों के मुताबिक यदि र्कोई मरीज डाट्स कोर्स को बीच-बीच में दो से तीन बार कुछ दिनों के लिए छोड़ देता है। तो टीबी की दवाएं उस पर असर नहीं करती। ऐसे मरीज को एमडीआर के रूप में चिन्हित किया जाता है। इन मरीजों में टीबी का वैक्टीरिया इतना ताकतवार हो जाता है। कि डाट्स कोर्स उसे मार नहीं पाता।
टीबी के खास लक्षण :
- दो हफ्ते पुरानी खांसी।
- अक्सर शाम को बुखार आना।
- तेजी से वजन का कम हो जाना।
- भूख नहीं लगना।
- रात को पसीना आना।
- खांसी में खून आना।
डीटीओ डॉ आरके दिनकर बताया कि एमडीआर पेशेंट अपने आसपास अपने जैसे मरीजों की पूरी चेन बना देता है। उसके संपर्क में अधिक वक्त तक रहने वाले सामान्य लोग भी एमडीआर केस में तब्दील हो जाते हैं। एमडीआर मरीजों में रेसिस्टेंस टीबी वैक्टीरिया देता है। ऐसे मरीजों में इनफेक्शन के जरिए जिन लोगों को टीबी की बीमारी लगती है। उनमें टीबी का खतरा अधिक रहता है।
सीएमओ डॉ राकेश तिवारी ने बताया कि चिकित्सा क्षेत्र में प्रदेश में 2013 में डाट्स प्लस प्रोग्राम चलाए जाने की योजना है। जो अभी दिल्ली, लखनऊ, समेत कुछ जगहों पर लागू है। योजना के आने से प्रयोगशालाएं, लैब, अति आधुनिक तरीकों की मशीनें आदि की स्थापना होनी है। लोगोें में जागरूकता की काफी कमी है। टीबी रोगी अपना नियमित इलाज कराना चाहिए।
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