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... तो इस तरह भी बदल सकता है बुनियादी शिक्षा का ढांचा

Pilibhit

Updated Wed, 24 Oct 2012 12:00 PM IST
पीलीभीत। सरकारी बच्चों की बुनियादी शिक्षा पर करोड़ों रुपये खर्च कर रही है। शिक्षकों का वेतन, स्कूल भवन, किताबें, शिक्षण सामग्री, छात्रवृत्ति और मिड डे मील पर भारी भरकम धनराशि खर्च होती है, फिर भी इन स्कूलों से गुणवत्तापूर्ण शिक्षण का लक्ष्य कभी पूरा नहीं होता। बुद्धीजीवी वर्ग का मानना है कि सरकार यदि सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के बच्चों की बुनियादी शिक्षा सरकारी स्कूलों में ही अनिवार्य कर दे तो व्यवस्था में परिवर्तन आएगा।
वर्तमान में जिले के 1195 प्राथमिक और 566 उच्च प्राथमिक स्कूलों में अध्ययनरत 246587 बच्चों को शिक्षा प्रदान करने के लिए 6365 शिक्षकों की तैनाती है। सरकार इस व्यवस्था पर शिक्षकों के वेतन मद में करीब 15 करोड़, छात्रवृत्ति पर आठ करोड़, मिड डे मील पर 2.75 करोड़ रुपये मासिक खर्च करती है। शिक्षण सामग्री पर 7.5 करोड़ और ड्रेस पर 9.86 करोड़ रुपये वार्षिक खर्च होते हैं। इस तरह साल भर में कुल मिलाकर 326 करोड़ रुपये खर्च होते हैं। इतना पैसा खर्च करने के बाद भी इन स्कूलों में अध्ययनरत बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं मिल पाती। प्राइवेट स्कूलों में अध्ययनरत बच्चों के सामने यह बच्चे कहीं भी ठहर नहीं पाते। व्यवस्था में परिवर्तन के लिए शिक्षकों को समय समय पर प्रशिक्षण, डांट फटकार, विभागीय कार्रवाई जैसे प्रयास भी होते हैं लेकिन स्थिति फिर भी नहीं बदलती। उच्चाधिकारियों के निरीक्षण में इन स्कूलों की शैक्षिक गुणवत्ता कई बार उजागर हो चुकी है। बुद्धिजीवी वर्ग इससे चिंतित हैं। अमर उजाला के साथ बातचीत में बुद्धिजीवी वर्ग ने व्यवस्था में सुधार के लिए कुछ पहलुओं पर चर्चा की। यदि सरकार इसे गंभीरता से ले तो परिवर्तन की उम्मीद की जा सकेगी।
ऐसे आ सकेगा बदलाव
सरकारी स्कूलों में पढ़ाई के नाम पर खानापुरी मात्र होती है। यही कारण है कि किसी शिक्षक का बच्चा इन स्कूलों में नहीं पढ़ता। कम से कम शिक्षकों के बच्चों के दाखिले तो अनिवार्य रूप से इन्हीं स्कूलों में होने चाहिए। व्यवस्था में बदलाव आ जाएगा।
कुश कुमार
अधिवक्त ा
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कहीं गुणवत्ता खराब तो कहीं मंहगी शिक्षा
सरकारी स्कूलों में शैक्षिक गुणवत्ता अत्याधिक खराब और प्राइवेट स्कूलों में बेहद मंहगी है। अभिभावकों की इस समस्या पर सरकार का ध्यान ही नहीं जाता। अधिकारियों के बच्चों के एडमीशन सरकारी स्कूलों में हों तो व्यवस्था खुद ब खुद संभल जाएगी।
सैय्यद अली नवेद,
समाजिक कार्यकर्तां
अधिकारियों के बच्चों के हों एडमीशन
करोड़ों खर्च के बाद भी बुनियादी शिक्षा का ढ़ांचा बेहद कमजोर है। सरकारी स्कूलों में पढ़ाई की औपचारिक्ता होती है। सुधार के प्रयास जमीनी हकीकत को छूते तक नहीं। बदलाव के लिए सरकारी वेतन पाने वालों के बच्चों के एडमीशन सरकारी स्कूलों में हों।
डॉ विपिन नीरज
सार्थक दिशा में हों प्रयास
सरकारी स्कूलों में कई बार निरीक्षण के दौरान देखने को मिला कि बच्चे कुछ सीख नहीं पा रहे हैं। इसमें सुधार की आवश्यकता है। सुधार के लिए सरकारी प्रयास सार्थक दिशा में हों और शिक्षक अपने दायित्वों को ईमानदारी से पूरा करें। बदलाव आएगा।
शशि गुप्ता
अध्यक्ष, बाल कल्याण समिति
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