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‘गुमनाम आत्माओं’ को भी मिली तृप्ति

Pilibhit

Updated Tue, 16 Oct 2012 12:00 PM IST
पीलीभीत। जिनके ‘अपने’ बिछुड़ जाते हैं। मौत भी ‘राज’ बनकर रह जाती है। उन ‘गुमनाम’ लोगों के अंतिम सफर के साथी अरुण दास चंचल लाशों से उठती दुर्गंध की कभी परवाह नहीं करते। हर लावारिस लाश के वारिस बनने वाले अरुण दास चंचल ने इस पर उनकी भटकती आत्माओं को तृप्त करने के लिए श्राद्ध कर एक अभिनव प्रयास किया है।
शहर में बंगाली रेस्टोरेंट के मालिक अरुण दास चंचल उम्र के 44 बसंत पार कर चुके हैं। करीब 14 साल पहले हादसे में एक अनजान की मौत हो गई। अंतिम संस्कार के लिए कोई भी आगे नहीं आया। तब अपने पिता धीरेंद्र दास की प्रेरणा से उन्होंने खुद लावारिस लाश का अंतिम संस्कार किया। बकौल अरुण, इससे उन्हें ऐसा आत्मिक सुख मिला कि इसके बाद हर अज्ञात लाश का वह अंतिम संस्कार कराने लगे। जिस धर्म का मृत व्यक्ति होता है, उसी धर्म की परंपरानुसार उसका अंतिम संस्कार करते हैं। अब चाहे सिविल पुलिस हो या जीआरपी। अज्ञात शव मिलते ही पहली कॉल अरुण के पास आती है और वह उसके अंतिम संस्कार की तैयारी में जुट जाते हैं। उनके इस कार्य से लोग उनसे कतराते हैं। अरुण अपने इस कार्य की चर्चा भी नहीं चाहते। शायद, यही वजह है अपने रेस्टोरेंट से कुछ घंटों की छुट्टी लेकर चुपके से तैयारी की और आचार्य पंडित दिनेश प्रसाद बहुगुणा के साथ शहर से सटे देवहा नदी के ब्रह्मचारी घाट पर पहुंचे गए, जहां विधिविधान से पिंडदान आदि करने के बाद हवन किया और मृतकों की आत्माओं की तृप्ति की कामना के साथ पंडितों को भोजन कराया। अमर उजाला को फिर भी जानकारी लग गई और इस पर वह खुद हैरान होते हुए बोले, इसे मैं किसी को बताना नहीं चाहता था।
आत्मा की आवाज पर कराया श्राद्ध
बकौल अरुण, जिनका वह 14 सालों से अंतिम संस्कार कर रहे थे। उनका कभी श्राद्ध नहीं किया। शुक्रवार की सुबह जब वह सोकर उठे तो उनकी अंतर्मन ने कहा, पितृपक्ष में मरने वाली की आत्मा तृप्ति के लिए आती है, जिनका तुमने अंतिम संस्कार किया है, उन्हें तृप्ति कौन दिलाएगा। बस, यह जेहन में कौंधते ही आचार्य दिनेश प्रसाद बहुगुणा से बात की। उन्होंने इसके पितृ विसर्जन का दिन उपयोगी बताया। हजारों-हजार आत्माओं को तृप्ति दिलाकर वह सुख की अनुभूति कर रहे हैं।
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