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धान की फसल में तना छेदक और सूंड़ी का प्रकोप

Pilibhit

Updated Sun, 19 Aug 2012 12:00 PM IST
समय से दवा का छिड़काव है उपाय
बढ़ते रोगों से गिर रही धान की उत्पादन क्षमता

पीलीभीत। तराई क्षेत्र की धान, गेहूं और गन्ने की फसलें बरसात के दिनों में तमाम रोग की चपेट में आ जाती हैं, समय से दवा का छिड़काव न होने से फसलों के उत्पादन में गिरावट आती है। समय से दवा का छिड़काव कर फसल को रोगों से बचाया जा सकता है।
धान, गेहूं और गन्ना जिले की प्रमुख फसलें हैं। कृषि विभाग के आंकड़ों के मुताबिक जिले में इस बार करीब 154000 हेक्टेयर धान की रोपाई की गई है। बरसात के दिनों में खासतौर पर धान की फसल में तमाम प्रकार के रोग लग जाते हैं, लेकिन किसान जागरूकता के अभाव में ध्यान नहीं देता है, जिससे उत्पादन में गिरावट आ जाती है। बरसात के समय तना छेदक और पत्ती लपेट कीट धान की फसल में लग जाते हैं। तना छेदक कीट की सूंड़ियां काफी हानिकारक होती हैं। यह हल्के पीले शरीर वाली तथा नारंगी-पीले सिर की होती हैं। मादा सूंड़ी के पंख पीले होते हैं। यह पौधे की गोभ में प्रवेश कर जाती हैं, जिससे पौध की बढ़वार रुक जाती है। कीट पौधे के गोभ के तने को काट देती है, जिससे गोभ सूख जाता है और बालियाें का रंग सफेद पड़ने लगता है। पत्ती लपेटक सूंड़ी हरे रंग के शरीर तथा गहरे भूरे रंग के सिर वाली दो से 2.5 सेमी लंबी होती है। ये पत्तियों को दोनों किनारों को जोड़कर नालीनुमां रचना बनाती हैं। यह कीट उसी के अंदर रहकर हरे पदार्थ को खुरचकर खाती हैं। कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डॉ एसएस ढाका ने बताया कि यह सूंड़ी 20-30 दिन के जीवनकाल में कई पत्तियों को नुकसान पहुंचाती है। कृषि वैज्ञानिक श्री ढाका के मुताबिक पांच प्रतिशत प्रति वर्ग मीटर से अधिक गोभ मृत होने पर रसायनों का प्रयोग करना चाहिए। तना छेदक की रोकथाम के लिए कार्बोफूरान तीन जी 20 किलोग्राम प्रति हेक्टर की दर से 3-5 सेमी स्थिर पानी में अथवा कारटाप हाइड्रोेक्लोराइड चार प्रतिशत 18 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से 3-5 सेमी स्थिर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए। पत्ती लपेट कीट की रोकथाम के लिए क्यूनालफास, क्लोरोपाइरीफास, ट्राइजोंफास, मोनोेक्रोटोफास का छिड़काव कर फसल को बचाया जा सकता है।

जिंक की कमी से भी गिरता है उत्पादन
कृषि वैज्ञानिक एसएस ढाका बताते हैं कि अभी भी तमाम किसान पुरानी व्यवस्था के अनुसार खेती कर रहे हैं। अब खेती की तैयारी में आधुनिकीकरण की आवश्यकता है। किसानों को मिट्टी की जांच जरूर करानी चाहिए। जहां तक हो सके संतुलित उर्वरक का प्रयोग फसलों में करना चाहिए। उर्वरकों में जिंक का प्रयोग बेहद जरूरी है। आमतौर पर जिंक की कमी के लक्षण फसलों में आमतौर पर दिखाई पड़ते हैं।
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