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जमीं नदी में, कागजों में रह गया नाम

Pilibhit

Updated Sat, 18 Aug 2012 12:00 PM IST
कई पट्टेदारों की भूमि शारदा के कटान में चली गई
सन 2004 में हुए थे 19 लोगों को पट्टे
पत्नी को भी बनाया गया था खातेदार
किसान भुखमरी के कगार पर

माधोटांडा। शारदा किनारे बसाए गए 19 पट्टेदारों की भूमि और आवास शारदा के निशाने पर हैं। इससे उनमें दहशत है। कुछ की जमीन नदी के कटान में समा चुकी है, जिनके परिवार भुखमरी के कगार पर हैं।
वर्ष 2004 में पट्टे की भूमि देते समय पति के साथ पत्नी को भी संयुक्त रूप से खातेदार बनाया जाए। इसी के चलते रामनगरा बुझिया में 39 पट्टे दो-दो एकड़ के आवंटित किए गए। इससे महिलाओं का हौसला बढ़ा और उन्होंने कृषि कार्यों में पतियों से ज्यादा बढ़चढ़ कर हिस्सेदारी की, जिसका नतीजा यह निकला आज सब्जी उत्पादन के रूप में इस इलाके की महानगरों तक पहचान बन गई है लेकिन इस साल शारदा के कटान से 19 पट्टेदारों की भूमि का सफाया होता जा रहा है। अब वर्तमान सरकार से क्या चाहती हैं यह महिलाएं......

खून पसीना बहाकर खेती योग्य बनाई भूमि को शारदा अपने गर्भ में समेटती जा रही हैं। ऐसे में बच्चों को पालने का संकट पैदा हो जाएगा और दूसरों के खेतों पर मजदूरी करने को मजबूर होना पड़ेगा।
ललिता विश्वास, रामनगरा बुझिया

पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने पट्टे की भूमि देकर हम महिलाओं के पति के साथ नाम दर्ज करवाए थे। शारदा के कटान में काफी जमीन चली गई। बची जमीन भी कभी नदी में समा सकती है।
सिखाराय, रामनगरा बुझिया

शारदा नदी के किनारे पट्टे ही गलत किए गए थे। कटान से इंदिरा आवास भी गया और जमीन भी चली गई। सड़क पर डेरा जमाए हैं। सरकार को हम जैसे लोगों को शीघ्र पट्टा देकर ऊंचे स्थान पर बसाना चाहिए।
रूबीना बेगम, रामनगरा बुझिया

पट्टे की भूमि पर नाम दर्ज होने से महिलाओें ने कड़ी मेहनत कर तपती धूप में काम कर फसलों को उगाया था। पांच वर्षो से बाढ़ से भूमि में पानी भर जाता था, लेकिन इस वर्ष भूमि नदी में समा गई। ऐसे में परिवार का पालन-पोषण कैसे होगा।
ममता, रामनगरा

पति के साथ पट्टे की भूमि पर नाम दर्ज होने से लगा था कि महिलाओं को अधिकार मिलने लगा है लेकिन भगवान न जाने क्यों रूठ गया। जमीन नदी में चली गई केवल कागजों में ही नाम रह गया।
अंजली विश्वास, रामनगरा बुझिया

जंगल किनारे बाघ, हाथी आदि जंगली जानवरों के खौफ के बावजूद पेट की खातिर परिवार के साथ रहकर खेती कर खुश थे, लेकिन अब मालूम नहीं यह सरकार कब और कहां बसाएगी भी या नहीं।
अंजू विश्वास, रामनगरा
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