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नाम ही नहीं मोक्ष को भी तरसती हैं लावारिस लाशें

Pilibhit

Updated Mon, 11 Jun 2012 12:00 PM IST
पीलीभीत। लावारिस लाशों की कहानी बड़ी ही दुखद है। पहले तो यह लाशें अपने नाम और पहचान को तरसती हैं फिर मोक्ष को। लावारिस लाशों की अंतिम क्रिया को लेकर हर कोई मुंह मोड़ लेता है और फिर समाजसेवी संस्थाओं को तलाशा जाता है, फिर भी पल्ले पड़ीं तो उन्हें केरोसिन और कूड़े करकट के ढेरों में फूं क दिया जाता है। इसमें से तमाम लाशें अधजली ही रह जातीं हैं जो शमशान घाटों पर कुत्तों का निवाला बनती हैं।
जिले में भी लावारिस लाशों के साथ ऐसा ही बर्ताव होता है। यहां जनवरी माह से अब तक 21 ऊपर लावारिस लाशें मिल चुकी हैं। इनमें से ज्यादातर कि अंतिम क्रिया कुछ ऐसे ही संपन्न हुई है। गुमनाम लाशों के साथ ऐसा महज इसलिए किया जाता है कि अंतिम क्रिया जिम्मेदारों की जेब पर बोझ होती है। समाजसेवी संस्थाओं के सामने न आने पर गुमनाम लाशों की जिम्मेदारी संबंधित थाने के सिपाही पर डाली जाती है। जेब से खर्च हो रहे धन को बचाने को सिपाही भी खानापूर्ति कर शमशान वालों को लाश सौंप देते हैं और फिर शमशान वाले इन लाशों के साथ मिले नाम मात्र के रुपयों में ही केरोसिन और कूड़े करकट से फूंक देते हैं। इसके बाद यह देखना मुनासिब नहीं समझा जाता कि लाश पूरी तरह से खाक हो पाई है या नहीं। इसमें से तमाम लाशें अधजली रहकर जानवरों का निवाला बन जाती हैं।

बाक्स
जिले में मिली माह वार लावारिस लाशें
माह शव
जनवरी : 02
फरवरी : 03
मार्च : 05
अप्रैल : 06
मई : 03
जून : 02 (10.06.12 तक)
बाक्स
धन मंजूर, लेकिन जटिल प्रक्रिया बनी जी का जंजाल
लावारिस लाशों के संस्कार के लिए धन की व्यवस्था होती है, लेकिन इसकी प्रक्रिया काफी जटिल होने से लाश के संस्कार में आने वाले खर्च को पाने के लिए सालों लग जाते हैं। इसी के चलते प्रक्रिया के तहत काम न कर संबंधित सिपाहियों को संस्कार का जिम्मा सौंप दिया जाता है, जो उनकी जेब पर बोझ होता है।
वर्जन
जिले में मिली लावारिश लाशों का अंतिम संस्कार बेहतर ढंग से हो सके इसलिए एक निजी संस्था का सहयोग लिया जाता है। लाशों की कोई खराबी नहीं होने दी जाती है। अंतिम संस्कार के लिए धन मंजूर है, लेकिन इसकी प्रक्रिया काफी जटिल है।
डॉ अरविंद भूषण पांडे
एएसपी, पीलीभीत
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