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मानव-वन्य जीव संघर्ष तो खुद ही बढ़ा रहा जंगलात

Pilibhit

Updated Wed, 30 May 2012 12:00 PM IST
पीलीभीत। बाघों की मौत के एक कारण मानव-वन्य जीव संघर्ष भी माना जाता है। हरीपुर रेंज में दो बाघों के शव मिलने के मामले में तफ्तीश का एक कोण यह भी था। इसके बाद भी जंगल में पशु चराने की छूट और लोगों की आवाजाही निर्बाध चल रही है।
बाघों की मौत मामले की जांच अब सिर्फ प्वाइजनिंग पर टिक गई है। अधिकारियों ने बरामद पड्डे के नमूने जांच को भेजने के बाद छुट्टी पा ली है। इधर गौढ़ी वालों को रात में उठाया और सुबह छोड़ा जा रहा है। वन अधिकारी अपनी इस सक्रियता की रिपोर्ट हर पल शासन से लेकर मीडिया तक को दे रहे हैं, लेकिन वह इन घटनाओं को रोकने के लिए कितना संवेदनशील हैं, इसका अंदाजा महोफ के जंगल में खुलेआम घास चरते जानवरों को देखकर आसानी से लगाया जा सकता है। अमर उजाला का यह संवाददाता मंगलवार को जंगल के किनारे स्थित गौढ़ियों का जायजा लेने पहुंचा तो वहां पालतू पशु चरते नजर आए। जंगल में अधखाए पड्डे का शव मिलने मात्र से यह सच सामने आ गया था कि पालतू पशुओं के जंगल में चरने पर कोई रोक नहीं है। यह हकीकत तब है, जब इस जंगल में 40 से 45 बाघों की संख्या खुद महकमे के अधिकारी बताते हैं।
अब बाघों की मौत हो गई है तो हो-हल्ला मचा है। गौढ़ी वालों को दोषी बताया जा रहा है, लेकिन यह यहां किसकी मदद से रहने लगे? सैकड़ों की संख्या में पशुओं के डेरे जमते गए, तब इन पर रोक क्यों नहीं लगी? वन विभाग की दूरदर्शी टीम ने पहले क्यों नहीं सोचा कि जंगल में चरते जानवर को बाघ खाएगा तो उसका परिणाम क्या होगा? अब घटना हो गई, फिरभी पालतू पशु जंगल में ही चर रहे हैं। यदि पड्डे में जहर लगाने की बात सच साबित होती है तो इन सब सवालों का एक ही जवाब होगा कि वन विभाग के कर्मचारियों ने पशु पालकों को छूट न दी होती तो हम दो दुर्लभ बाघों को नहीं खोते।
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गौढ़ियों से संचालित होता है लाखों का कारोबार
जंगल किनारे दर्जनों गौढ़ियां हैं। गौढ़ी में प्रमुख रूप से दुग्ध उत्पादन होता है। इसमें दुग्ध पालक छप्परों के नीचे एक साथ 100 से डेढ़ सौ तक जानवर समूह में पालते हैं। इनका दूध पीलीभीत के अलावा लखीमपुर और उत्तराखंड के कई शहरों को सप्लाई होता है। इस प्रकार इन गौढ़ियों से प्रतिदिन लाखों के दूध का कारोबार होता है। सूत्र बताते हैं कि इनके संचालन में वन विभाग के अधिकारियों तक का संरक्षण होता है।
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उत्तराखंड और खीरी इलाके में हैं गौढ़ियां : डीएफओ
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डीएफओ वीके सिंह का कहना है कि पीलीभीत जिले में एक भी गौढ़ी नहीं है। ये गौढ़ियां उत्तराखंड और खीरी क्षेत्र में हैं। महोफ रेंज में पशुओं के जंगल में अब भी विचरण करने की बावत पूछे जाने पर कहते हैं कि इस इलाके में उत्तराखंड की खटीमा रेंज में स्थित गौढ़ियों के मवेशी आ जाते हैं। जंगल में जानवरों के प्रवेश पर पाबंदी लगा दी गई है, लेकिन इसके बाद भी यदि कोई पशु जंगल में चरता पाया गया तो संबंधित पशु पालक से लेकर वन कर्मचारी तक पर नियमानुसार कार्रवाई होगी।
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