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मॉडर्न एजूकेशन में स्मार्ट हुए नोएडा के स्कूल

Noida

Updated Wed, 19 Sep 2012 12:00 PM IST
नोएडा। हाईटेक सिटी के स्कूल शिक्षा देने के तरीकों में काफी स्मार्ट हो गए हैं। पैरागॉन, इन्क्वायरी मैथाडोलॉजी, स्मार्ट बोर्ड, प्रोक्सीमिटी कार्ड, रोबोटिक्स समेत अंतर्राष्ट्रीय स्तर के तमाम तरीकों और तकनीकों का इस्तेमाल बच्चों को पढ़ाने में हो रहा है। तकनीकों की धुरी में एक्सप्रेसवे स्थितस्कूल सबसे पहले गिने जाते हैं। ये तकनीकें सभी स्कूल नहीं अपना रहे हैं, लेकिन प्रतिस्पर्धा हर साल कुछ नया करने को विवश कर रही है। पेश है एक रिपोर्ट -
शुरुआत रेत पर आकृति बनाने से
छोटे बच्चों को पढ़ाने और सिखाने के लिए शुरुआत में स्कूलों में रेत का इस्तेमाल किया जाता है। रेत पर बच्चे शब्द व आकृति बनाते हैं। शिक्षकों का कहना है कि बच्चों की अंगुलियां काफी मुलायम होती हैं। वे पेसिंल पकड़ने में दिक्कत महसूस करते हैं। ऐसे में लिखने के लिए रेत अच्छा माध्यम है। कुछ दिन बाद बच्चों को क्रियॉन से पढ़ाया जाता है।

इन्क्वायरी मैथाडोलॉजी
तमाम बच्चे जिज्ञासु होते हैं। जिज्ञासाओं के जवाब तलाशने के लिए इन्क्वायरी मैथाडोलॉजी (सीखने का माध्यम) का इस्तेमाल होता है। इसमें बच्चों को थीम दी जाती है। इससे उनके दिमाग में खुद सवाल उठते हैं और वे जवाब ढूंढते हैं। सवालों के जवाब के लिए बच्चों को उससे संबंधित स्थान पर ले जाया जाता है। उदाहरण के तौर पर नर्सरी व केजी के बच्चों की बारिश की थीम में उन्हें बादलों की स्थिति की जानकारी दी जाती है। बच्चे खुले मैदान में जाते हैं और बादलों के रंग से बारिश के आसार को पहचानते हैं। कहानी के माध्यम से बच्चे पानी के पूरे चक्र को समझते हैं। बाल्टी में बारिश के पानी को इकठ्ठा किया जाता है। इससे बच्चे पानी की स्वच्छता का भी अंदाजा लगाते हैं। एक दीवार (वंडरवॉल) पर शिक्षक बच्चों के प्रश्न लिखते हैं। जैसे-जैसे जवाब मिलते जाते हैं, वे सवाल वहां से हटा लेते हैं।

पैरागॉन
इसमें बच्चे अपनी सभ्यता और सामान्य ज्ञान की प्रेक्टिकल जानकारी हासिल करते हैं। 40 दिन की कक्षा के बाद बच्चों की पैरागॉन एसेंबली की जाती है। इसमें बच्चों को सिंधु घाटी की सभ्यता, मोहन जोदड़ो जैसी वेशभूषा पहनाने के अलावा मिट्टी के जरिये कलाकृति बनाना सिखाया जाता है। प्रायोगिक तौर पर बच्चों को शिक्षित करने का कांसेप्ट यूके का है। इसके लिए बाकायदा यूके के शिक्षकों को रखा गया है। यह नंबर बच्चों के रिजल्ट में भी जोड़े जाते हैं।

आईकार्ड यानी प्रोक्सीमिटी कार्ड
स्कूल बस में बैठने से पहले, स्कूल में प्रवेश के लिए, लाइब्रेरी से किताबें इश्यू कराने, छुट्टी के समय स्कूल से जाने और बस से उतरने तक प्रोक्सीमिटी कार्ड का इस्तेमाल बच्चों के लिए अनिवार्य है। यह सिर्फ आईकार्ड नहीं, उनकी सुरक्षा के नजरिये से भी अहम है। इन कार्ड्स में एक माइक्रोचिप होती है, जो स्कूल के इंटरप्राइज रिसोर्स प्लानिंग सिस्टम (ईआरपी) से कनेक्ट होती है। बच्चे बस में बैठने, उतरने, स्कूल में प्रवेश करने और बाहर जाने के लिए बस व स्कूल के गेट पर लगी मशीन पर इस कार्ड से पंच करते हैं।

बसों में जीपीएस
बसों की स्थिति पर नजर रखने के लिए ग्लोबल पोजीशनिंग सिस्टम (जीपीएस) का इस्तेमाल किया जाता है। इस सिस्टम से स्कूल की बसें कनेक्ट रहती हैं। ट्रांसपोर्ट मैनेजर बस की लोकेशन की समय-समय पर जांच करता है।

स्मार्ट बोर्ड (इंटरराइट बोर्ड)
स्कूलों में स्मार्ट बोर्ड का चलन बढ़ता जा रहा है। यह ब्लैक बोर्ड से बिल्कुल अलग होते हैं। हालांकि इन्हें ब्लैक बोर्ड के स्थान पर लगाया और स्लाइड सिस्टम के जरिये आसानी से खिसकाया जा सकता है। स्मार्ट बोर्ड शिक्षक के लैपटॉप से कनेक्ट होते हैं। सफेद बोर्ड पर प्रोजेक्टर के जरिए एनीमेशन, वीडियो और पॉवर प्वाइंट से पढ़ाया जाता है।

लैंग्वेज लैब
लैंग्वेज लैब में साउंड और एक्शन, दोनों का मिश्रण होता है। जौली फॉनेक्स नाम के प्रोग्राम की मदद से बच्चों को शब्दों का उच्चारण सिखाया जाता है। हर आवाज के साथ बच्चे एक्शन भी करते हैं। जैसे पक्षियों की आवाज में उनके एक्शन।

रोबोटिक्स
नए स्कूलों ने पाठ्यक्रमों में रोबोटिक्स को भी शामिल किया है। यह ऊपर की कक्षाओं के छात्रों के लिए है। स्कूलों में रोबोटिक्स लैब हैं। इसमें बच्चे प्रोग्रामिंग सीखते हैं और पार्ट्स से रोबोट बनाते हैं।

स्टोरी टेलिंग
बच्चों की कल्पनाओं को बढ़ाने और उन्हें प्रेरित करने के लिए स्टोरी टेलिंग का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें हर कक्षा में रोल प्ले कॉर्नर बनेे होते हैं। इसमें बैठकर बच्चे कहानी बनाते हैं और प्रैक्टिकली उसे समझते हैं। बच्चे कॉर्नर में रखी किरदारों की वेशभूषा पहनते हैं और उसी किरदार के बारे में बात करते हैं। उदाहरण के तौर पर शिक्षक, डॉक्टर, इंजीनियर आदि।

स्कूल बैग रखते हैं
शहर में कई स्कूल ऐसे हैं, जहां नर्सरी के बच्चों को सिर्फ एक डायरी लानी और ले जानी होती है। कुछ स्कूल ऐसे भी हैं, जो जूनियर विंग तक के छात्रों के बैग स्कूल में ही जमा करा लेते हैं। बच्चों को होमवर्क नहीं दिया जाता। सारी एक्टिविटी स्कूल में ही कराई जाती है।

ब्रेक फास्ट और खाना स्कूल में
ब्रेकफास्ट और दोपहर का खाना बच्चों को स्कूल में ही दिया जाता है। यह खाना डाइट चार्ट के हिसाब के होता हैं। इसके जरिये स्कूल बच्चों को सेहतमंद रहना सिखाते हैं।


तकनीक व माध्यमों को शामिल करना जरूरी
प्रेक्टिकल ज्ञान बच्चों के भविष्य के लिए बहुत जरूरी है। अमेरिका जैसे देशों पर आधारित तकनीकों और माध्यमों को शिक्षा में शामिल करना कैरियर के लिए जरूरी हो गया है।
नीति भल्ला
हेड, जूनियर विंग, जेनेसिस ग्लोबल स्कूल, सेक्टर-132

रोचक तरीका जरूरी
पढ़ाई में रोचक तरीकों का इस्तेमाल जरूरी है। इससे बच्चों में सीखने की ललक पैदा होती है।
सुनंदा ग्रोवर
प्रिंसिपल, मानव रचना इंटरनेशनल स्कूल, सेक्टर-51
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